
बैतूल। ईमानदारी, संघर्ष और लगन से किसी भी उम्र में बदलाव लाया जा सकता है। इसका जीवंत उदाहरण शनिवार को उल्लास नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत ढोडवाड़ा स्कूल में आयोजित परीक्षा में देखने को मिला, जहां शिक्षकों की मेहनत और प्रेरणा से ग्रामीण बुजुर्गों ने साक्षर बनने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया। शुरुआत में कई बुजुर्ग परीक्षा में शामिल होने से हिचक रहे थे। जैसे ही इसकी जानकारी शिक्षकों को मिली, उन्होंने इसे एक चुनौती की तरह लिया। शिक्षक सुबह से ही तेज धूप में गांव के घर-घर पहुंचे और बुजुर्गों व उनके परिजनों को साक्षरता के महत्व के बारे में समझाया।
शिक्षक मदनलाल डढोरे, राजू गंगारे, राजेंद्र कुमार बेले और अक्षर साथी बद्रीप्रसाद पवार ने सिर्फ समझाइश ही नहीं दी, बल्कि जो बुजुर्ग खेतों में बने मकानों में रहते हैं, उनके पास खुद पहुंचे। कई बुजुर्गों को अपनी गाड़ी से परीक्षा केंद्र तक लाया गया और परीक्षा के बाद सम्मानपूर्वक घर भी छोड़ा गया।
इस परीक्षा की सबसे खास तस्वीर 90 वर्षीय ईठा बाई पंडाग्रे रहीं, जिन्होंने इस उम्र में भी साक्षर बनने का जज्बा दिखाया। उनकी सीखने की ललक देखकर शिक्षक भी भावुक हो गए। परीक्षा में उनसे अक्षर ज्ञान और चित्र पहचान से जुड़े सवाल पूछे गए, जिनका उन्होंने सही जवाब दिया। अन्य बुजुर्ग परीक्षार्थियों ने भी इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि सरकार का यह प्रयास उनके जैसे अनपढ़ लोगों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। उनका कहना था कि अब वे अपना नाम लिखना और किताब पढऩा सीख सकेंगे, जो उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा है। शिक्षक मदनलाल डढोरे ने कहा कि बच्चों को पढ़ाना तो उनका कर्तव्य है, लेकिन जब बुजुर्ग भी अक्षर ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो शिक्षकीय जीवन का असली उद्देश्य पूरा होता हुआ महसूस होता है। शिक्षकों के इस समर्पण की ग्रामीणों, पालक-शिक्षक संघ के सदस्यों और अन्य शिक्षकों ने भी सराहना की। सभी ने माना कि यदि इसी तरह प्रयास होते रहे तो गांव में निरक्षरता जल्द ही खत्म हो सकती है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामीण और शिक्षक उपस्थित रहे।
Published on:
14 Mar 2026 09:31 pm
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