29 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

सुविधाओं के अभाव में बच्चे खेल मैदान से गायब

-कैसे निखरकर सामने आएंगे खेल प्रतिभाएं। एस्ट्रोटर्फ हॉकी मैदान में अभ्यास करते खिलाड़ी।

3 min read
Google source verification
Due to lack of facilities children disappear from the playground,Due to lack of facilities children disappear from the playground

Due to lack of facilities children disappear from the playground,Due to lack of facilities children disappear from the playground


बैतूल। जिले में खेलों को बढ़ावा दिए जाने के नाम पर महज औपचारिकता पूरी की जा रही है। खेलों के नाम पर हर साल छोटी-मोटी स्पर्धा कराई जाती है। जनप्रतिनिधि और अधिकारी फोटो खिंचवाते हैं और घर चले जाते हैं। सही मायने में आज तक खेलों को बढ़ावा देने के लिए जमीनी स्तर से कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। जिले में खेलों की बुरी दुर्दशा है। शहर में खेल के लिए पर्याप्त मैदान नहीं है। खेल एवं युवा कल्याण विभाग में पदस्थ अधिकारी भी कुछ नहीं कर पा रहे हैं। खेलों के नाम पर स्कूलों का भी यही हाल है। स्कूलों में खेल मैदान, खेल शिक्षक और सुविधाओं का अभाव है तो बेहतर खिलाड़ी कैसे सामने आ सकते हंै।
शहर में ही खेल मैदानों का टोटा
शहर में ही खेल मैदानों का टोटा बना हुआ है। बैडमिंटन और हॉकी के अलावा कोई खेल मैदान नहीं है। पुलिस मैदान और स्टेडियम के भरोसे खेल आयोजन कराए जाते है। नगर पालिका के पास एक स्विमिंग पुल है तो वह भी काफी छोटा है,इसमें बड़ी स्पर्धाएं नहीं कराए जा सकती। शहर में अलग से वॉलीबाल ग्राउंड, फुटबाल ग्राउंड, बड़े स्विमिंग पुल, क्रिकेट मैदान, खो-खो मैदान, कबड्डी, बॉस्केटबॉल ग्राउंड की आवश्यकता है। वही लोगों की माने तो खेल सुविधाओं में विस्तार होने से बेहतर खिलाड़ी सामने आ सकते हैं। खेल से भ्रष्टाचार भी समाप्त होना चाहिए। खेलों की जो राशि आती है वह खिलाडिय़ों पर पूरी तरह से खर्च नहीं हो पाती है। खिलाडिय़ों को सुविधाएं मिलेगी तभी खेल में देश का भविष्य सुरक्षित हो सकता है। खेल संघ पदाधिकारियों को भी इसमें रुचि दिखानी होगी।
८० फीसदी पीटीआई के पद खाली
स्कूलों में होने वाली खेल स्पर्धाओं के संचालन के लिए प्रत्येक स्कूल में एक पीटीआई प्रशिक्षक का होना अनिवार्य है, लेकिनविगत २० वर्षों से प्रदेश स्तर पर पीटीआई की भर्ती प्रक्रिया पर रोक लगी हुई है। लिहाजा स्कूलों में नई नियुक्तियां नहीं हो सकी है। ट्रायवल एवं एजुकेशन विभाग के स्कूलों में ८० फीसदी पीटीआई के पद खाली पड़े हुए हैं। स्कूलों में खेलों को बढ़ावा देने की सरकारी मंशा पर इसी वजह से दम तोड़ रही है। शिक्षा विभाग के पास महज १३ पीटीआई हैं जबकि ट्रायल विभाग के पास २२ पीटीटाई पदस्थ बताए जाते हैं। पीटीआई के अभाव में हाईस्कूल एवं हायर सेकंडरी स्कूल के एक-एक शिक्षक को खेलों का प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि वे स्कूलों में खेलकूद स्पर्धाएं करा सके। स्कूलों में खेल मैदान के और बुरे हाल है। अधिकारियों के मुताबिक ७५ प्रतिशत स्कूलों में खेल मैदान नहीं है। मैदान हैं भी तो खेल सुविधा नहीं है।
खेलो के नाम पर सिर्फ समर कैंप का आयोजन
खेलों के नाम पर खेल युवक कल्याण विभाग हर साल समर केैंप का आयोजन भर करता हैं। गर्मी के दिनों में सिर्फ एक महीने तक समर कैंप में खेल गतिविधियों का आयोजन होता है। इसके बाद खेलों की कोई सुध नहीं ली जाती है। साल भर खेल गतिविधियां बंद पड़ी रहती है। यही कारण है कि जिले से बेहतर खिलाड़ी नहीं निकल पा रहे हैं। हालांकि कुछ खेल हैं जिनमें साल भर खेल गतिविधियां संचालित की जाती है, लेकिन इनमें भी कोच का अभाव बना हुआ है। जैसे खेल युवक कल्याण विभाग के माध्यम से एस्ट्रोटर्फ मैदान पर बच्चे हॉकी का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि प्रशिक्षण के लिए कोच तक नियुक्त नहीं है। विगत पांच सालों से कोच का पद खाली पड़ा है। आउट सोर्स से कोच रखने व्यवस्था हैं लेकिन दो साल से यह भी नियुक्त नहीं किया है।
बजट के अभाव में नहीं होती बड़ी स्पर्धाएं
जिले में हॉकी संघ, फुटबाल संघ है। इसके बाद भी पिछले आठ-दस वर्षों से राष्ट्रीय स्तर की बड़ी स्पर्धाएं नहीं हो पाई है। जबकि पहले राष्ट्रीय स्तर की हॉकी और फुटबाल की स्पर्धाएं होती थी। इन स्पर्धाओं की ही देन है कि मुख्ममंत्री के बैतूल आने पर करोड़ों रुपए के एस्ट्रोटर्फ मैदान की सौगात मिली थी। पिछले तीन-चार वर्षों से दोनों ही संघ के माध्यम से कोई बड़ी स्पर्धा नहीं कराई गई है। बॉस्केट बाल और तैराकी संघों के तो और बुरे हाल है। इन संघों ने आज तक कोई बड़ी स्पर्धा नहीं कराई है। वही संघ पदाधिकारियों के अनुसार बजट के अभाव में बड़ी स्पर्धाएं नहीं करा पाते हैं।

Story Loader