
happy engineers day
भिलाई . शहर के इंजीनियरिंग छात्र नैनो टेक्नोलॉजी की मदद से एक ऐसी डिवाइस बनाने में जुटे हैं, जिससे हार्ट पेशेंट को लगाए जाने वाले पेस मेकर की बैटरी बदलने का झंझट पूरी तरह से खत्म हो जाएगा। हार्ट में लगी यह माइनर डिवाइस पेशेंट के बात करने पर उत्पन्न होने वाले कंपन से ऊर्जा पैदा करेगी। इससे दोबारा ऑपरेशन करने की जरूरत भी नहीं होगी। यह नैनो पार्टिकल्स ४३ मिलि वॉट ऊर्जा उत्पन्न करेंगे, जो हार्ट को पंप कराने में काफी होगा। अब तक पेसमेकर में दस साल के बाद इसकी बैटरी बदलने की जरूरत पड़ती है। इस प्रोजेक्ट को हाल ही में आईआईटी हैदराबाद में हुए टेक्नो फेस्ट में द्वितीय पुरस्कार मिला है।
तीन जनवरी को हुआ प्रजेंटेशन
श्रीशंकराचार्य टेक्निकल कैंपस ईएंडआई विभाग में पढ़ रहे प्रणव अग्रवाल, सोना दरगड़ और ईटीसी विभाग की अनुराधा खलखे ने नैनो टेक्नोलॉजी चार्जिंग यूनिट का प्रजेंटेशन ३० जनवरी को आईआईटी हैदराबाद में हुए एक सम्मेलन में दिया। यहां देश के २८ टॉप इंजीनियरिंग कॉलेजों की टीम शामिल हुई। इसमें से भिलाई के इन छात्रों ने दूसरा स्थान हासिल किया। उन्हें प्रमाण पत्र के साथ नगद पुरस्कार भी दिए गए साथ ही रिचर्स को आगे बढ़ाने के लिए मार्गदर्शन दिए जाने का आश्वासन भी दिया गया। प्रोजेक्ट को देश के ख्याति प्राप्त विशेषज्ञों ने भी सराहा है।
ट्रैफिक के शोर से चार्ज होगा मोबाइल
आने वाले समय में अब चलते-फिरते बिना चार्जर के भी स्मार्ट फोन चार्ज हो सकेंगे। ट्रैफिक का शोर, संगीत, ट्रेन की आवाज और लोगों की भीड़ वाली जगहों से उत्पन्न होने वाली ध्वनि चार्जर का काम करेगी। यंग इंजीनियर्स के मुताबिक नैनो पार्टिकल्स के साथ एक इलेक्ट्रानिक किट जोडऩे पर यह पांच वॉल्ट एनर्जी पैदा कर सकते हैं। एक स्मार्ट फोन को चार्ज करने में इतनी ही एनर्जी की जरूरत होती है।
कैसे करेगा काम
नैनो पार्टिकल्स को दो इलेक्टोड के बीच में रखा जाएगा। जब आवाज होगी तो यह पार्टिकल्स कंपन पैदा करेंगे। कंपन से ही मिलि वॉल्ट बनने लगेगा। यह एक निरंतर प्रक्रिया होगी जो हार्ट को पंप कराने में मददगार साबित होगी। यंग इंजीनियर्स ने नैनो पार्टिकल्स तैयार कर लिया है। अब इलेक्ट्रोड और नैनो पार्टिकल्स के समायोजन की तैयारियों में जुटे हैं। यदि यह रिचर्स सफल रही तो जल्द ही हार्ट पेसमेकर में लगने वाली बैटरी का सटीक विकल्प सामने होगा।
भिलाई में नहीं संसाधन
इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे युवाओं का कहना है कि डिवाइस तैयार करने के लिए भिलाई में संसाधनों की कमी है। इसके लिए आईआईटी मुम्बई या एनआईटी की हाईटेक लैब चाहिए। सबसे जरूरी 'टैफलॉनÓ आईआईटी की लैब में ही मिलेगा। आईआईटी की ओपन लैब से आगे की रिचर्स पूरी करेंगे।
Published on:
15 Sept 2018 01:37 pm

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