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खाकी-खादी की ‘छत्रछाया’ में कत्लेआम की खबर पर प्रशासन जागा, टीम पहुंचने से पहले ही माफिया रफूचक्कर

- बड़ी कार्रवाई का दावा फेल: खनिज विभाग की टीम के रवाना होते ही माफिया के 'मुखबिर' हुए सक्रिय, पहाड़ियों पर पसरा सन्नाटा

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The administration woke up to the news of the massacre under the 'patronage' of khaki and khadi.

The administration woke up to the news of the massacre under the 'patronage' of khaki and khadi.

राजस्थान पत्रिका के अभियान 'खाकी-खादी की छत्रछाया में पहाड़ियों का कत्लेआम' के प्रकाशित समाचार का बड़ा असर हुआ है। जिला कलक्टर के निर्देश के बाद खनिज विभाग और पुलिस की संयुक्त टीम जहाजपुर की पहाड़ियों पर कार्रवाई करने पहुंची, लेकिन नतीजा 'ढाक के तीन पात' ही रहा। टीम के पहुंचने से पहले ही खनन माफिया मशीनों और लवाजमे के साथ फरार हो गए।

विभाग के गेट से ही शुरू हो गई 'जासूसी'

खनिज विभाग की कार्यप्रणाली पर खुद विभाग के अधिकारियों ने ही सवाल खड़े कर दिए हैं। खनिज विभाग के अधिकारी ने स्वीकार किया कि विभाग के कार्यालय के बाहर कुछ संदिग्ध लोग बैठे रहते हैं। जैसे ही टीम रवाना होती है, माफिया का खुफिया तंत्र व्हाट्सएप के जरिए पल-पल की लोकेशन आगे भेज देता है। यही कारण रहा कि जहाजपुर के पांचा का बाड़ा, लाला का बाड़ा और मुंडी भट्टा से लेकर धांधोला तक फैली अरावली की पहाड़ियों पर टीम को एक भी माफिया नहीं मिला।

अब वन विभाग के पाले में गेंद

खनिज विभाग के अनुसार, जिन क्षेत्रों में अवैध खनन हो रहा है, वे वन विभाग और नगर पालिका जहाजपुर की सीमा में आते हैं। विभाग अब अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए वन विभाग को पत्र लिखने की तैयारी कर रहा है। हालांकि, अधिकारी का दावा है कि जल्द ही फिर से औचक कार्रवाई की जाएगी।

राजनीतिक संरक्षण और बेखौफ माफिया

जहाजपुर क्षेत्र में उपखंड कार्यालय से महज कुछ दूरी पर लाल पत्थर का अवैध सीना चीरा जा रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि माफिया को 'सियासी कवच' मिला हुआ है, जिसके चलते प्रशासन की हर हरकत की जानकारी उन तक पहले पहुंच जाती है। उपखंड अधिकारी राजकेश मीणा की ओर से मांगी गई वैध खनन की सूची भी विभाग ने मेल के जरिए भेज दी है।

पत्रिका विश्लेषण: सिस्टम में बैठे 'विभीषण' कौन?

  • सवाल: अगर टीम गोपनीय तरीके से निकली, तो माफिया को व्हाट्सएप पर लोकेशन किसने दी?
  • हकीकत: सरकारी दफ्तर के बाहर जमावड़ा लगाने वाले 'मुखबिरों' पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?
  • असर: अरावली की पहाड़ियों का अस्तित्व दांव पर है, लेकिन फाइलें सिर्फ पत्राचार में उलझी हैं।