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कभी सिक्योरिटी गार्ड और इलैक्ट्रीशियन का काम किया, आज सरकार ने बुलाकर दिया पद्मश्री सम्मान

सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी में हाथ आजमाया..कुछ दिन इलैक्ट्रिशियन का काम भी किया.. जानिए, पद्मश्री भज्जू श्याम के संघर्ष की कहानी..

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भोपाल। दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मध्य प्रदेश के आदिवासी गोंड कलाकार भज्जू श्याम को पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उनके समेत 43 हस्तियों को पद्म सम्मान से नवाजा गया। डिंडौरी के छोटे से गांव पाटनगढ़ निवासी श्याम मजदूरी के लिए भी कभी डिंडौरी के गांव-गांव काम के लिए भटकते थे। आर्थिक तंगी से बदहाल और परिवारिक जिम्मेदारी के चलते उन्हे काम की तलाश में महज 16 वर्ष की उम्र में ही घर छोड़ना पड़ा। काम की तलाश में भोपाल पहुंचकर उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड के साथ मजदूरी भी की। तमाम मुश्किलों के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी।

गोंड प्रधान पेंटिंग से ही ख्याति बटोरने वाले श्री श्याम अपने गृहग्राम पाटनगढ़ में गोंडी कहानी संरक्षित रखने स्कूल खोलने का सपना देख रहे हैं। अपनी कला के बारे में भज्जू श्याम बताते हैं कि उन्हें पेंटिंग के बारे में एबीसीडी भी नहीं मालूम थी, लेकिन रंग भरते-भरते वे इस मुकाम तक पहुंच गए कि देश- विदेश में उनकी पेंटिंग की चर्चा होने लगी। चित्रकार भज्जू श्याम गोंड समाज के रीति रिवाज, गोंडी पूजा अर्चना और गोंड राजाओं के बारे में सौ से अधिक चित्र बना चुके हैं।

राष्ट्रपति ने किया सम्मानित
आपको बता दें कि मध्य प्रदेश के आदिवासी गोंड कलाकार भज्जू श्याम को पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में उन्हें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री सम्मान से नवाजा। केंद्र सरकार ने 69वें गणतंत्र दिवस समारोह के एक दिन पहले 25 जनवरी को पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया था।

भज्जू श्याम मध्य प्रदेश के जबलपुर के पास स्थित एक छोटे से गांव पाटनगढ़ के निवासी हैं। भज्जू श्याम का बचपन आदिवासी अंचल में बेहद अभाव के बीच बीता था। माता-पिता की आर्थिक हालत ऐसी नहीं थी कि वह अपने बच्चों की छोटी से छोटी ख्वाहिश भी पूरी कर सके। तमाम कोशिशों के बावजूद परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं आया तो भज्जू श्याम ने 16 साल की उम्र में घर छोड़ दिया।

उन्होंने पहले नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक की राह पकड़ी। यहां कुछ दिन पौधे लगाने का काम किया. हालांकि, इस काम में मन नहीं रमा तो उन्होंने राजधानी भोपाल का रुख कर लिया। यहां उन्होंने सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी में हाथ आजमाया। फिर कुछ दिन इलैक्ट्रिशियन का काम भी किया। इसके साथ वे अपनी कला को साकार भी करते गए, धीरे धीरे उनके बनाए चित्रों की चर्चा देश विदेश में होने लगी। इसके बाद सरकार ने उन्हें इस साल पद्मश्री पुरुस्कार से सम्मानित करने का फैसला किया।

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