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दुनिया में बहुत कम बचे हैं ये कछुए, सिर पर रहता है लाल निशान

बायोडायवर्सिटी बोर्ड ने चंबल सैन्चुरी में शुरू किया दुर्लभ बटागुर प्रजाति के कछुओं का संरक्षण, नदी में बनाई हैचरी में शिफ्ट किए जा रहे अंडे

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Anwar Khan

Sep 11, 2016

tortoise conservation

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भोपाल। मध्यप्रदेश में बहने वाली चंबल नदी के पास दुनिया की अति संकटग्रस्त कछुओं की प्रजाति बटागुर मिलने के बाद उन्हें बचाने के लिए एक-एक अंडा सहेजा जा रहा है। नदी किनारे ये कछुए अपना घरौंदा बनाकर अंडे देते हैं। लेकिन, सैंड माइनिंग, बांध से पानी छोड़े जाने और नदी किनारे तरबूज आदि की खेती के कारण इनके घरौंदों के साथ-साथ अंडे नष्ट हो जाते हैं। इससे प्रजाति विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई थी। अब इन कछुओं के अंडे दूसरे स्थान पर हैचरी में शिफ्ट कर संरक्षण के प्रयास जारी हैं। नतीजे में संख्या बढऩे लगी है।




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मप्र बायोडायवर्सिटी बोर्ड ने टर्टल सर्वाइवर अलायंस के साथ मिलकर इन कछुओं को बचाने के लिए चम्बल रिवर सेंचुरी में प्रोजेक्ट शुरू किया है। चम्बल सेंचुरी में कछुओं की दो दुर्लभ प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से बटागुर केचुगा को आईयूसीएन ने क्रिटिकली इनडेंजर घोषित किया है। इसके साथ बटागुर ढोंगोका नाम की प्रजाति भी यहां पाई जाती है।




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इसलिए होता है इनका शिकार
बटागुर केचुगा के सिर पर लाल मुकुट यानी लाल क्राउन रूफ की मौजूदगी इसे अन्य कछुओं से अलग बनाती है। इसलिए इनका शिकार हुआ। इस कारण अब विश्व में कुछेक स्थानों पर ही यह प्रजाति पाई जाती है।




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बढ़ती जा रही संख्या
बोर्ड की प्रोजेक्ट ऑफिसर एलिजाबेथ थॉमस ने बताया कि मानवीय गतिविधियों के कारण बटागुर कछुए सर्वाइव नहीं कर पा रहे थे, इसलिए बोर्ड ने सैन्चुरी में इन्हें बचाने के लिए प्रयास शुरू किए हैं। यह कछुए चम्बल नदी के किनारों पर रेत में नेस्ट बनाकर अंडे देते हैं, लेकिन ये अंडे बच नहीं पा रहे थे। इसलिए इनकी संख्या बढ़ नहीं रही थी। अब इनके घरौंदों को अंडों सहित नदी में बनी हैचरी में शिफ्ट कर दिया जाता है। हैचरी में जब इन अंडों से बच्चे निकल आते हैं तो उन्हें फिर से नेस्ट में शिफ्ट कर देते हैं। इसके लिए तीन हैचरी बनाई गई हैं।





अभी 9622 कछुए जीवित
टर्टल सर्वाइवर एलायंस के शैलेंद्र सिंह यह काम देख रहे हैं। कछुओं के अंडों को हैचरी में शिफ्ट करने के बाद उनके जीवित रहने का प्रतिशत 83 तक पहुंच गया है। अभी तक 598 नेस्ट थे, जिसमें लगभग 11 हजार अंडे थे। अब इनको हैचरी में शिफ्ट किया गया। इनमें से 9 हजार 622 कछुए के बच्चे जीवित निकले।

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