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भोपाल का वृंदावन, 12 फीट की तुलसी बनी कौतुहल, लिम्बा बुक में दर्ज कराने के कर रहे प्रयास

भोपाल में लगा है तुलसी का सबसे ऊंचा पौधा, 12 फीट है ऊंचाई

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साऊथ टीटी नगर के सरकारी क्वार्टर परिसर के आसपास लगे है कई पौधे

भोपाल. तुलसी के औषधीय गुणों से हर कोई परिचित है। आमतौर पर तुलसी के छोटे-छोटे पौधे होते हैं, लेकिन शहर के साऊथ टीटी नगर क्षेत्र में एक सरकारी क्वार्टर परिसर में 12 फीट का तुलसी का पौधा लगा है, यहीं नहीं इस क्षेत्र में आसपास भी ऐसे कई बड़े पौधे लगे हुए हैं। इस क्षेत्र में लोगों के बीच इतने ऊंचे तुलसी के पौधे कौतुहल का विषय बने हुए हैं। इस क्वार्टर के साथ-साथ पास आसपास के क्षेत्रों में भी यह पौधे लगाए गए हैं। कोई इसे लौंग तुलसी कह रहा है तो कोई वन तुलसी कह रहा है। तुलसी के इन पौधों के कारण यह क्षेत्र शहर का वृंदावन बनता जा रहा है।

लिम्बा बुक ऑफ रिकाॅर्ड में कराएंगे दर्ज

यह तुलसी का पौधा लगाने वाली कविता रावत का कहना है कि वे तकरीबन पांच साल पहले यहां रहने आई थी। इसकी कलम किसी ने उनके पति को दी थी। इसे अपने बगीचे में लगाया और धीरे-धीरे यह अप्रत्याशित रूप से बढ़ता चला गया। वर्तमान में इसकी ऊंचाई लगभग 12 फीट है। वर्तमान में सबसे ऊंचे तुलसी के पौधे का वर्ल्ड रिकॉर्ड ग्रीस के पास है, जिसकी ऊंचाई तकरीबन 11 फीट है, जबकि यह 12 फीट तक ऊंचा है। इसके लिए हमने लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए आवेदन भी मंगाया है, शीघ्र ही इसके लिए दावा करेंगे।

आसपास भी लगाए हैं कई पौधे

पानसिंह रावत का कहना है कि इस तुलसी की खासियत यह है कि यह हर मौसम में हरी भरी रहती है। आमतौर पर रामा और श्यामा तुलसी सर्दियों में पाला पड़ने के बाद सूख जाती है, लेकिन यह अत्यधिक सर्दी में भी नहीं सूखती। इसके पत्ते आम तुलसी के पत्तों से काफी बड़े है। जब इसे लगाया गया था तब यहां पथरीली जमीन थी। यहां बगीचे में कई तरह की और भी वनौषधियां लगाई है। इसके साथ ही आसपास मैदान, मंदिर में भी यह तुलसी के पौधे लगाए है जो फल फूल रहे हैं।

एक्सपर्ट व्यू

यह लौंग तुलसी, कई तरह से गुणकारी

मैंने वीडियो के माध्यम से यह पौधा देखा है, यह लौंग तुलसी है, औषधीय रूप से यह काफी लाभकारी होती है, इसे चाय में डालकर भी पीते हैं। आमतौर पर यह पांच से छह फीट ऊंची होती है लेकिन अगर इसके अनुरूप जमीन, प्रकाश सहित आबोहवा रहे, तो इसकी ऊंचाई और बढ़ती है। मंजरियों से बीज गिरने पर झाडि़यों की तरह यह फैलती जाती है।

डॉ राजेश सक्सेना, पूर्व वरिष्ठ प्रधान वैज्ञानिक, मप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग