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1842 में अंग्रेजों के कर वसूली कानून और अत्याचारों के विरुद्ध हुआ था विद्रोह

शहीद भवन में नाटक 'बुंदेला विद्रोह 1842' का मंचन

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भोपाल। जनयोद्धा नाट्य समारोह के अंर्तगत गुरुवार को नाटक 'बुंदेला विद्रोह 1842' का मंचन किया गया। इसका निर्देशन डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने किया। डेढ़ घंटे के इस नाटक में 35 कलाकारों ने 1842 के प्रथम सशस्त्र स्वाधीनता संग्राम को दिखाया, जो 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व हुआ था, इन क्रांतिकारियों को देश याद नहीं करता। नाटक में दिखाया गया कि 1842 में अंग्रेजों के कर वसूली कानून और अत्याचारों से तंग आकर नरहट के जमीदार मधुकर शाह, हृदय शाह, पारीक्षत, बखत बली सहित अनेक राजाओं ने विद्रोह का ऐलान कर दिया। इस विद्रोह को बुंदेलखंड के सभी राजाओं ने साथ दिया। सेना ने मिलकर अंग्रेजों की संपत्ति लूटी, पुलिस थानों में आग लगा दी, जिससे अंग्रेजी शासन हिल गया और अंग्रेजों में विद्रोही सेना के प्रति डर फैल गया।

रियासत लौटाने का लालच सुन राजाओं ने किया था विश्वासघात

नाटक में आगे दिखाया गया कि अंग्रेजों के विरुद्ध हुए इस विद्रोह का जनता का भी भारी समर्थन मिलने लगा। राज्यों में स्वाधिनता की अलख जलने लगी। नाटक में दिखाया गया कि अंग्रेजी प्रशासन ने निर्णय लिया कि मधुकर शाह और उसके साथियों को पकड़ा जाए। इसके लिए उन राजाओं पर भारी इनाम की घोषणा की, परंतु इससे भी सफलता हाथ नहीं लगी। तब उन्होंने राजा मर्दन सिंह और राजा बखत बली को लालच दिया कि वे मधुकर, हृदय शाह और उनके साथियों को पकड़ने में साथ दें तो रियासत लौटा देंगे। उनकी यह चाल सफल रही। एक-एक कर सभी राजा पकड़े गए। इस प्रकार 1842 के विद्रोह का अंग्रेजों ने क्रूरता से दमन कर दिया गया।

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