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कारगिल विजय दिवस : 1999 की लडाई में प्रदेश के ये बहादुर हुए थे शहीद

Kargil Vijay Diwas 2018 - कारगिल पर जीत को 19 साल हो चुके हैं, पर जिस तरह इसकी छाप हम सभी के दिलों पर है, उससे लगता है मानों यह कल की ही बात हो। भारत के लिए आत्म सम्मान की यह लड़ाई जब जीती गई तो इसे विजय दिवस के रूप में मनाया गया।

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Kargil Vijay Diwas 2018

फरवरी में पश्तो भाषा में रेडियो पर आने लगे थे संदेश

भोपाल. कारगिल पर जीत को 19 साल हो चुके हैं, पर जिस तरह इसकी छाप हम सभी के दिलों पर है, उससे लगता है मानों यह कल की ही बात हो। भारत के लिए आत्म सम्मान की यह लड़ाई जब जीती गई तो इसे विजय दिवस के रूप में मनाया गया।

इस लड़ाई में देश भर से सैनिकों ने हिस्सा लिया था, पर इसमें कुछ बहादुर अफसर भोपाल से भी थे। भोपाल के मेजर अजय प्रसाद देश के लिए शहीद हुए थे। वहीं ब्रिगेडियर विनायक और कर्नल मिश्र आज भी उस फतह को याद कर जोश से भर जाते हैं। वे कहते हैं कि उस फतह से बड़ा कोई पुरस्कार नहीं है।

अभी मेरी पोस्टिंग 24 एनसीसी बटालियन मुरादाबाद में है। 1999 में मैं कैप्टन था। 315 आर्टिलरी फील्ड रेजीमेंट में मेरी पोस्टिंग थी। जैसे ही पता चला कि टाइगर हिल पर कब्जा हो चुका है। हमारे साथ 8, सिक्ख बटालियन को बुलाया गया।

हमें टारगेट दिया गया कि हिल पर बैठे दुश्मनों का पता लगाकर उन्हें बर्बाद कर दिया जाए। 14 मई 1999 को हिल की तरफ कूच करना शुरू किया। द्रास सेक्टर में घुमरी के पास चढ़ाई शुरू की। हमारे पास इंफॉर्मेशन बहुत कम थी कि दुश्मन की लोकेशन क्या है और वे कितने लोग हैं। वे हमारे इलाके में कैसे और कब आए ये भी ज्यादा जानकारी नहीं थी। शाम 4.30 बजे हमे चढ़ाई शुरू की।

कुछ समय बाद हम पर बमबारी होने लगी। हम बचते हुए ऊपर की और बढ़ते गए। हिल तक पहुंचने के लिए हमें बर्फ से जमा हुए नाले से होकर जाना पड़ा। अगले दिन शाम 4.30 बजे हम वहां पहुंचे। वहां टैंट, खाना पकाने के निशान और सिगरेट पड़ी हुई मिली।

वे हमें देख हिल के ऊंची चोटी पर पहुंच चुके थे। हमने बर्फ पर ही नाइट स्टे किया। अगले दिन फिर हम पर बमबारी होने लगी। तोप खाने का इस्तेमाल कर हमने उसे रोका। हम अंदाजे से उस लोकेशन पर फायर कर रहे थे जिस और से हम पर फायरिंग हो रही थी। काउंटर बमारी के कारण 250 सैनिकों की जान बच सकी। हम समझ चुके थे कि इस रास्ते से हम उन तक नहीं पहुंच सकते। हिल को क्रॉस पर तीसरे दिन पिछले हिस्से में पहुंचे।

यहां जमी हुई झील, जिसे परियों का तालाब कहा जाता है वहां हमारी टीम पहुंच चुकी थी। हमारा प्लान था कि रात को अटैक कर दुश्मनों की रसद लाइन काट दी जाएगी। चांदनी रात में वे हमारी हर गतिविधी को आसानी से देख पा रहे थे। उन्होंने रात में ही हम पर अटैक करना शुरू कर दिया। एक ऑफिस के साथ पांच जवान शहीद हो गए। कई अन्य घायल हुए। वे चारों और से टाइगर हिल पर कब्जा कर बैठे थे।

नाकाम रहने पर हमने वापस आकर ऑफिसर्स को इसके बारे में बताया। फिर पहले दिन वाले रास्ते से ही ऊपर की और बढ़े। अगले दिन सुबह दस बजे से बमबारी शुरू की जो रात नौ बजे चली। हमारी एक टीम आगे बढ़ती जाती और दूसरी बमबारी करती। हमने कई टारगेट पूरी तरह से ध्वस्त कर दिए।

टारगेट को इंडिया गेट, हेलमेट, स्नोप, टंग, राइनो हॉर्न, टाइगर हिल टॉप जैसे नाम दिए, सारे टारगेट रिकॉर्ड किए ताकि अगली बार वहां आसानी से आक्रमण किया जा सके। फ्रंट अटैक के बाद भी हमें काफी कैजुअल्टी हुई थी। मैं 21 दिनों वहां डटा रहा। 26 जनवरी 2000 को मुझे वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

कर्नल ओपी मिश्रा
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डिकोड करने में ली स्पेशलिस्ट की मदद
मेरी उन दिनों डोडा सेक्टर में कमांडिंग ऑफिसर था। हमारी टीम एंटी टेरिरिस्ट ऑपरेशन में लगी हुई थी। फरवरी 1999 में ऑपरेटर्स ने बताया कि रेडियो पर किसी अनजान भाषा में ट्रांसमिशन हो रही है। ये लगातार बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है। हमारी टीम में से किसी को भी वो भाषा समझ नहीं आ रही थी।

हमने इसकी रिपोर्ट ऑफिसर्स को की। स्पेशलिस्ट की मदद ली गई तो पता चला कि ये पाश्तो लैंग्वेज है, जो पीओके में बोली जाती है। मार्च-अप्रैल तक हमें ये साफ हो चुका था कि वहां गतिविधियां हो रही है। बटालिक एरिया में एक गड़रिया ने पाकिस्तानियों के चोटी पर आने की सूचना दी। शिमला समझौते के बाद वहां हमारा फोर्स नहीं रहता था। दुश्मन फरवरी में वहां आ चुका था।

बिग्रेडियर आर विनायक, वीएसएम
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मेजर अजय ने बताया था, लड़ाई पाकिस्तानी सेना से है

मेजर अजय प्रसाद कारगिल युद्ध के शुरुआती दौर में दुश्मनों से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। सेना में शामिल होने के बाद से वे श्रीलंका में लिट्टे से भिड़े। वहां कामयाबी के बाद मिजोरम में उल्फा उग्रवादियों को नेस्तनाबूद किया और फिर पाकिस्तानी सेना के छक्के छुड़ाते हुए कारगिल युद्ध में शहीद हो गए।

शहीद मेजर अजय प्रसाद के पिता आरएन प्रसाद बताते हैं1992 में जब अजय मिजोरम के उखरूल में तैनात थे। वहां उग्रवादियों से उनकी कई बार मुठभेड़ हो चुकी थी और उग्रवादियों को भारतीय सेना से मात खानी पड़ रही थी। आरएन प्रसाद बताते हैं, मेजर अजय प्रसाद भी उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे, जिसने कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सैन्य अधिकारियों को यह बताया था कि भारतीय जवान आतंकवादियों से नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सेना से मुकाबला कर रहे हैं।

जब उन्हें यह बात समझ आई, तो उन्होंने और मदद की मांग की। अपनी जान की परवाह किए बिना उन्होंने अवंतीपुर में पाकिस्तानी सेना से एक के बाद एक तीन चौकियां छीन लीं, लेकिन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से भारतीय वायु सेना की मदद समय पर नहीं मिल सकी और दुश्मनों से लड़ते हुए वे माइन ब्लास्ट में शहीद हो गए।