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सेंट्रल जेल में सजा काट रहे कैदियों ने मांगा अपना हक, आप भी जानें आखिर माजरा क्या है?

राजधानी भोपाल की सेंट्रल जेल में सजा याफता कैदियों ने पुलिस प्रशासन से अपना हक मांगा है।

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भोपाल। राजधानी भोपाल की सेंट्रल जेल में सजा याफता बंदियों ने पुलिस प्रशासन से अपना हक मांगा है। जी हां यहां आपको बता दें कि हाल ही में भोपाल विधिक सेवा प्राधिकरण ने अभियान के तहत सेंट्रल जेल और बाल संप्रेषण गृहों में 'हक हमारा भी तो है' नामक अभियान संचालित किया था। जिसके तहत सेंट्रल जेल में बंदियों और बाल संप्रेषण गृहों में बच्चों की काउंसलिंग की गई। जिसमें जेल के बंदियों और बच्चों ने अपनी-अपनी परेशानी जाहिर की। कोई लंबे समय से अपने परिवार से बात करने को तरस रहा था, तो कोई अपने केस को लेकर आगे की कार्रवाई संबंधी जानकारी प्राप्त करने के लिए परेशान था।

50 फीसदी बंदियों को नहीं मिल पा रही कानूनी सहायता
सेंट्रल जेल में सजा काट रहे बंदियों में से 50 फीसदी बंदियों को किसी न किसी तरह की कानूनी सहायता चाहिए। 16 फीसदी बंदी ऐसे हैं जिन्हें, वकील नहीं मिला है। वहीं 8 फीसदी बंदी ऐसे हैं जिनके पास वकील तो है लेकिन, वे उनसे मिल नहीं पा रहे हैं। जबकि 14 फीसदी बंदियों को मेडिकल हेल्प नहीं मिल पा रही है। यही नहीं ऐसे ही कई अन्य बंदी भी हैं जिन्हे, किसी न किसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

जिला विधिक सेवा प्राधिकरण ने किया सर्वे
बाल संप्रेषण गृहों के 31 बच्चों में 14 बच्चों को भी कानूनी, चिकित्सक और अन्य प्रकार की मदद की जरूरत है। इस बात का खुलासा हाल ही में भोपाल जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा किए गए सर्वे में हुआ है।

बाल संप्रेषण ग्रहों से भी मिली शिकायतें
टीम ने ऑब्जर्वेशन होम में लगभग 31 बच्चों के साथ बातचीत की है। इन बच्चों में से 2 बच्चों को चिकित्सा सहायता की आवश्यकता थी तो, 3 बच्चों को उनके परिवार से संपर्क करने में मदद की जरूरत है। उनमें से 1 को वकील की आवश्यकता थी और उनमें से 8 को कुछ दूसरी शिकायतें थीं।

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18 वकीलों और 45 लॉ स्टूडेंट्स ने किया काम
हाल ही में भोपाल विधिक सेवा प्राधिकरण ने 'हक हमारा भी तो है' अभियान के तहत सेंट्रल जेल और बाल संप्रेषण ग्रहों में 63 लोगों की टीम गठित कर सभी बंदियों से बातचीत की। टीम में 18 जूनियर वकील और 45 लॉ स्टूडेंट्स को शामिल किया गया था। 1 नंवबर से 10 नंवबर तक चले इस सर्वे में करीब 3412 बंदियों की काउंसलिंग की गई है। जिसमें बंदियों का दर्द उनकी आंखों से छलक आया। इसके बाद अब हर बंदी तक उनकी गुहार के अनुसार लगातार सहायता पहुंचाई जा रही है।

जागरुकता कार्यक्रम के तहत हजारों को दी गई मदद
इस दौरान 8 जागरुकता कार्यक्रम आयोजित किए गए। जिनसे लाभांवित बंदियों में से 3212 को कानूनी सहायता प्रदान की गई। 45 गिरफ्तारियों को अदालत में पेश करने से पहले पुलिस स्टेशन में कानूनी सहायता प्रदान की गई और कुल 18 को रिमांड चरण में कानूनी सहायता प्रदान की गई।

दो साल बाद अपने परिवार को देख पाया बंदी
आंध्रप्रदेश का एक बंदी पिछले दो साल से अपने परिवार से विडियो कॉल पर बात नहीं कर पाया था। परिवार को हर समय चिंता सताई रहती थी। बंदी को मिर्गी के दौरे आते हैं। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की टीम से उसने विडियो कॉल से परिवार से बात करने की इच्छा जताई। टीम ने उस बंदी के घर वीडियो कॉल किया, तो बातचीत के दौरान बंदी सहित पूरी टीम ही इमोशनल हो गई।

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भोपाल जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से प्राप्त आंकड़े





































शिकायतबंदियों की संख्या
वकील नही हैं551
कोर्ट में अपना मामले का स्टेट्स जानने के लिए117
चिकित्सक संबंधी503
अपने वकील से संपर्क नहीं कर पा रहे294
जुवेनाइल क्लेम करने के संबंध में18
मानसिक बीमारी से संबंधित सहायता32
कुल बंदियों की संख्या 3412

इनका कहना है
प्रतिनिधित्व के लिए मिलें उचित अवसर
इस अभियान का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बंदियों को खुद का प्रतिनिधित्व करने का उचित अवसर दिया जाए और उन्हें मुफ्त कानूनी सहायता के बारे में भी जागरूक किया जाए। साथ ही कानून के साथ संघर्ष में बच्चों के लिए बाल देखभाल संस्थानों में भी उनका हक सुनिश्चित करना है।
- एसपीएस बुंदेला, सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, भोपाल

प्रशासन रहता है सतर्क
जेल प्रशासन हर बंदी के अधिकार के लिए सतर्क रहता है। समय-समय पर इन्हें अधिकारों के बारे में जागरूक किया जाता है। हालांकि कानूनी सहायता संबंधी शिकायतें कई बार आती हैं।
- राकेश भांगरे, अधीक्षक, सेंट्रल जेल, भोपाल