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भीमबैठिका स्थित विंध्याचल पर्वत पर ‘पांडवों की कुलदेवी

यहां पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान गुजारा था कुछ समय

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भीमबैठिका स्थित विंध्याचल पर्वत पर 'पांडवों की कुलदेवी

भोपाल/औबेदुल्लागंज. राजधानी से 40 किलोमीटर दूरी पर भीम बैठिका स्थित हैं। यहां विंध्याचल पर्वत पर 'पांडवों की कुलदेवीÓ विराजमान हैं। जिन्हें मां वैष्णो देवी के नाम से भी जाना जाता है। पांडवों ने यहां एक वर्ष के अज्ञातवास के दौरान कुछ समय बिताया था।

इस दौरान पांचों पांडवों ने द्रोपदी के साथ विंध्याचल पर्वत की पहाड़ी की गुफा में अपनी कुलदेवी की स्थापना की थी। पांडवों ने बारिश के चार माह यहां रुककर माता की आराधना की थी। इस कारण इस स्थान का नाम भीम बैठिका पड़ा, जो आज वल्र्ड हैरिटेज में गिना जाता है।

नीचे हैं दो कुण्ड
पांडवों ने पहाड़ के नीचे दो कुंड बनाए थे, जो वाणगंगा कुंड और पंाडव कुंड के नाम से जाने जाते हैं। दोनों कुंड में हमेशा पानी भरा रहता है। रातापानी अभयारण्य के वन्यप्राणी इन कुंडों से अपनी प्यास बुझाते हंै। यहां पहुंचकर सैलानी सुकून का अनुभव करते हैं।

जेब ढीली करने पर होते हंै माता के दर्शन
रातापानी बांध के नाम पर इस क्षेत्र का नाम रातापानी अभयारण्य पड़ा। मध्य प्रदेश शासन, वन विभाग की अधिसूचना द्वारा 1976 में इस क्षेत्र को अभयारण्य घोषित किया गया। भीमबैठिका का मंदिर अभयारण्य के अंदर होने से वन विभाग मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं से पैसा वसूलता है।

बने हंै छह आसन : मंदिर से जुड़े लोग बताते हंै कि यहां मंदिर के पास पहाड़ी के ऊपर पांचों पांडवों व द्रोपदी के बैठने के 6 आसन बने हुए हंै। यहां ब्रम्हलिपि में कुछ लिखा भी है। ऊपर जाने का रास्ता बंद है।

आयुर्वेद पद्धाति से इलाज
एक समय था जब भीमबैठिका आयुर्वेद पद्धाति के इलाज के लिए प्रसिद्ध था। बाबा सालिग रामदास लोगों का इलाज आयुर्वेदिक पद्धाति व जुड़ी-बूटियों से करते थे। क्षेत्र व लोग उस समय सालिग रामदास से इलाज कराने पहुंचते थे।

मेले का आयोजन
भीमबैठिका में रामनवमीं पर मेला लगता है। मंदिर समिति की ओर से दोनों नवरात्रि में मंदिर में हवन-पूजन एवं भंडारे का आयोजन किया जाता है। बताते हंै कि 40 साल पहले स्व. बाबा सालिग रामदास के समय सुबह-शाम आरती में माता की सवारी गजराज शामिल होते हंै। बाबा सालिग रामदास को सिद्धि प्राप्त थी। बाबा सालिगराम ने मंदिर के सामने ही समाधी ली थी। समाधि स्थान पर अब शिवजी की मूर्ति स्थापित है। यहां पहुंचने वाले भक्त मंदिर प्रांगण में भजन कीर्तन कर माता की आराधना करते हैं।

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