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विद्योत्तमा पूछती हैं- ‘अस्ति कश्चित् वाग्विशेष:’ इसे सुनकर कालिदास रच देते हैं महाकाव्य कुमार सम्भव, रघुवंश और खण्डकाव्य मेघदूत का प्रथम श्लोक

जवाहर बाल भवन में शासकीय कन्या आवासीय संस्कृत विद्यालय की छात्राओं ने दी संस्कृत नाटक 'विद्योत्तमा' की प्रस्तुति

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भोपाल

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Vikas Verma

Feb 19, 2019

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Sanskrit drama 'Vidyotma' Staged in Jawahar Bal Bhavan

भोपाल। एक अनुपम कवि, उसकी अनुपम उपमाएं और प्रतीक विराट प्रकृति का सुंदरतम कल्पनाशील वर्णन और उदात्त प्रेम का उतना ही अनुपम शृंगारिक चित्रण। यानी महाकवि कालिदास.... ऋतु संहार हो या मेघदूतम्, कुमार संभवम् हो या अभिज्ञान शाकुंतलम्, कुमार संभवम् या फिर रघुवंशम्, वे अपनी अद्भुत काव्य प्रतिभा के कारण प्रसिद्ध हुए। लेकिन संस्कृत भाषा के इस महान कवि और नाटककार कालिदास की प्रेम कहानी काफी इंट्रेस्टिंग है। मौजूदा जेनरेशन में शायद ही लोगों को उनकी प्रेम कहानी के बारे में पता हो। कालिदास और उनकी पत्नी विद्योत्तमा का चरित्र-चित्रण करते नाटक 'विद्योत्तमा' की प्रस्तुति सोमवार को जवाहर बाल भवन में हुई।

नाटक के माध्यम से कालिदास के जीवन के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डालने की कोशिश की महर्षि पतंजलि संस्कृत संस्थानम् द्वारा संचालित शासकीय कन्या आवासीय संस्कृत विद्यालय की छात्राओं ने। नाटक का लेखक विष्णुदत्त शास्त्री हैं जबकि निर्देशन राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानम् से पीएचडी कर रहे युवा निर्देशक अनुपम शुक्ल ने किया। इस नाटक के जरिए एक महामूर्ख कृष्णमुख के महाकवि कालिदास बनने की पूरी कहानी को मंच पर दिखाया गया।

शास्त्रार्थ में हारे विद्वान मूर्ख से करा देते हैं विद्योत्तमा का विवाह

नाटक में दिखाया गया है विद्योत्तमा विदुषी महिला थीं और उन्हें अपने ज्ञान पर बहुत अहंकार था। विद्योत्तमा ने यह घोषणा कर रखी थी कि वे उसी विद्वान से विवाह करेंगी, जो उन्हें शास्त्रार्थ में हरा देगा। सभी विद्वान यहां तक कि काशी के प्रकांड विद्वान भी उनसे शास्त्रार्थ में हार गए। इसके बाद सभी ने विद्योत्तमा को सबक सिखाने का निर्णय लिया और धोखे से एक मूर्ख व्यक्ति को विद्योत्तमा के सामने पेश किया, विद्योत्तमा को वो मूर्ख व्यक्ति विद्वान लगा और उससे विवाह कर लिया। जब विवाह के बाद उन्हें पता चला कि यह व्यक्ति तो महामूर्ख है तो विद्योत्तमा ने उन्हें लताड़ते हुए धक्का दिया। संयोगवश वह मां सरस्वती के चरणों में जा गिरते हैं, उनका आशीर्वाद प्राप्त कर वह कलकत्ता चले जाते हैं और महाकाली की कृपा से वे प्रकांड विद्वान महाकवि कालिदास बन जाते हैं।

विद्योत्तमा के वाक्य से कर देते हैं महाकाव्यों की रचना
अपने कवित्व से यश प्राप्त करते हुए जब वह उÓजैन नगरी पहुंचते हैं तो वहां संयोगवश उनकी मुलाकात विद्योत्तमा से होती है। कालिदास जब उनके घर पहुंचते हैं तो दरवाजा खोलने का निवेदन करते हैं, तब विद्योत्तमा उनसे चार शब्दों का एक वाक्य बोलती हैं 'अस्ति कश्चित् वाग्विशेष:Ó (क्या आपकी वाणी में कोई विशेषता है?) यह सुनकर कालिदास इन शब्दों से दो महाकाव्य और एक खंड काव्य के श्लोक की रचना कर देते हैं। 'अस्तिÓ शब्द से महाकाव्य 'कुमार सम्भव का पहला श्लोक (अस्त्य् उत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराज:। पूर्वापरौ तोयनिधी विगाह्य स्थित: पृथिव्या इव मानदण्ड:॥) 'कश्चित्Ó शब्द से खण्डकाव्य 'मेघदूतÓ का पहला श्लोक (कश्चित्कांता...) और 'वाग्विशेष:Ó शब्द से महाकाव्य 'रघुवंशÓ का पहला श्लोक (वागार्थविव...) की रचना की।

ब'चों को संस्कृत नाटकों से जोडऩे का प्रयोग
श्री नाट्यम गु्रप ऑफ संस्कृत ड्रामा से ताल्लुक रखने वाले अनुपम बताते हैं कि वे पिछले 10 वर्षों से काम कर रहे हैं। देश भर में करीब 50 से अधिक संस्कृत नाटकों का मंचन कर चुके हैं। अनुपम बताते हैं कि ब'चों को भी संस्कृत नाटकों से जोडऩे के लिए यह प्रयोग किया गया। महर्षि पतंजलि संस्थानम् की ओर से संचालित शासकीय कन्या आवासीय संस्कृत विद्यालय की छात्राओं के साथ मिलकर यह नाटक तैयार किया गया। अवधि करीब 1 घंटे की रही, नाटक में छात्राओं ने ही सभी महिला व पुरुष पात्र निभाए।

अतिथि के इंतजार में 30 मिनट तक स्वागत मुद्रा में खड़ी रही छात्राएं

इस नाट्य प्रस्तुति के दौरान बतौर मुख्य अतिथि महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी को आना था लेकिन वे नहीं पहुंची। वहीं लोक शिक्षण संचालनालय की आयुक्त जयश्री कियावत भी करीब 30 मिनट की देरी से पहुंची। जिस कारण छात्राएं मंच पर करीब आधे घंटे तक स्वागत मुद्रा में खड़ी रहीं। नाट्य प्रस्तुति देखने के लिए महिला एवं बाल विकास के संचालक अभय वर्मा, जवाहर बाल भवन के संचालक डॉ. उमाशंकर नगायच, महर्षि पतंजलि संस्थान के संचालक पीआर तिवारी और आवासीय संस्कृत विद्यालय की प्राचार्या समेत शहर के रंगकर्मी भी उपस्थित रहे।

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