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राम के इंतजार में शबरी हुई वृद्ध, राम ने खाए झुठे बैर

पांच दिवसीय वर्षगांठ समारोह के दूसरे दिन हुआ नाटक शबरी की प्रतीक्षा का मंचन  
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राम के इंतजार में शबरी हुई वृद्ध, राम ने खाए झुठे बैर

भोपाल। मप्र जनजातीय संग्रहालय में जनजातीय जीवन, देशज ज्ञान परम्परा व सौन्दर्यबोध पर एकाग्र छठवें वर्षगांठ समारोह के दूसरे दिन शुक्रवार को संग्रहालय के मुक्तकाश मंच पर कई प्रस्तुतियां हुईं। पहली प्रस्तुति में मप्र के ज्ञानसिंह शाक्य ने अपने साथी कलाकारों के साथ लांगुरिया गायन, देवी वंदना 'जगर मगर मठ होय मइया तेरी पूजा न जानू' सुनाया।

इसके बाद कलाकारों ने 'मठिया के खोल किवार लंगुरिया दुनिया ठाढ़ी दर्शन को', 'झूला उराय देय फूल बाग में हो माय' प्रस्तुत किया। 'मइया के भवन में घुटुअन खेले लंगुरिया' के साथ उन्होंने प्रस्तुति को विराम दिया। गायन प्रस्तुति के दौरान ज्ञानसिंह शाक्य का सहयोग हारमोनियम पर सुखदेव ने, ढोलक पर सुरेश कुमार ने, झींका पर गणेश गुप्ता ने, तबले पर राजेश कुशवाहा ने और गायन में शिवानी भदौरिया और हिमांशु शाक्य ने किया।

जनजातीय नृत्य सैला, भड़म, परघौनी और गुदुम बाजा की प्रस्तुति

जनजातीय नृत्य की की प्रस्तुति में दान सिंह मरावी ने अपने साथी कलाकारों के साथ गोंड जनजाति का सैला नृत्य प्रस्तुत किया। सैला छत्तीसगढ़ की गोंड जनजाति का आदिवासी नृत्य है, जो फसल की कटाई के बाद किया जाता है। जब अनाज घर में आ जाता है और मेहनत के रंग खेतों से होकर घर के आंगनों में बिखरने लगता है तो चारों ओर हर्ष उल्लास का माहौल होता है। इस नृत्य प्रस्तुति में करीब 25 कलाकार रहे।

इसके बाद आनंद कुमार भारती ने अपने साथी कलाकारों के साथ भारिया जनजाति का भड़म नृत्य दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया। इस प्रस्तुति में आनंद कुमार भारती का साथ लगभग 20 कलाकारों ने दिया। भड़म नृत्य के बाद शिव कुमार धुर्वे ने अपने लगभग 20 कलाकारों के साथ परघौनी नृत्य प्रस्तुत कर सभी दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। मप्र की आदिम जनजाति बैगा में विवाह के अवसर पर किये जाने वाले नृत्य को परघौनी नृत्य कहा जाता है।

इस नृत्य की विशेषता है कि इसमें एक हाथी की रचना की जाती है, जिस पर दूल्हा-दुल्हन के सेग-सम्बन्धी सवार हो नृत्य और विविध मुख-मुद्राओं को निर्मित करते हास्य उत्पन्न करते हैं। परघौनी विवाह के स्वागत का नृत्य है, परघौनी नृत्य के बाद दान सिंह मरावी ने अपने साथी कलाकारों के साथ गोंड जनजाति का गुदुम बाजा नृत्य प्रस्तुत करते हुए नृत्य प्रस्तुति को विराम दिया।

नृत्य नाटिका के बाद अब नाट्य प्रस्तुति में दिखाई 'शबरी की प्रतीक्षा'

गुरुवार को शबरी पर केंद्रित नृत्य नाटिका की प्रस्तुति के बाद शुक्रवार को शबरी के धैर्य और भक्ति पर केंद्रित नाटक 'शबरी की प्रतीक्षा' का मंचन प्रयागराज की रंग निर्देशिका सुषमा शर्मा के निर्देशन में संग्रहालय के मुक्ताकाश मंच पर हुआ। इस नाटक के केंद्र में शबरी है, भील जाति में उत्पन्न हुई श्रमणा नमक शबरी प्रारम्भ से ही अपने परिवेश से अलग संस्कार की थी, उसे पशु हिंसा से घृणा थी। अपने विवाह पर भोजन हेतु वध के लिए लाए गए पशुओं का जीवन बचने के लिए शबरी ने गृह त्याग दिया। भटकते-भटकते शबरी मतंग ऋषि के आश्रम के द्वार पर पहुंच गई।

मतंग ऋषि से उसने प्रभु सेवा करने को अपना लक्ष्य बताया, पर आश्रम की सामाजिकता को दृष्टि में रखते हुए मतंग ऋषि ने शबरी को गौशाला में गायों की सेवा का कार्य सौंप दिया। अपनी सेवा, मृदुस्वभाव और भक्तिभाव से जहां शबरी मतंग ऋषि की प्रिय शिष्या बन बैठी, वहीं दूसरी और अन्य आश्रमवासियों के क्रोध व ईष्र्या और विरोध के चलते शबरी ने आश्रम त्यागकर अलग कुटी बना ली।

अपनी मृत्यु को समीप जान मतंग ऋषि ने शबरी से कहा कि वह अपनी देह अवश्य धारण किए रहें, प्रभु राम-स्वरुप में अपने अनुज लक्ष्मण के संग उसे अवश्य दर्शन देंगे। वर्षों प्रतीक्षा के बाद शबरी की कुटी में प्रभु आए और शबरी के आदर-सत्कार से प्रसन्न हुए। प्रभु राम ने शबरी को नवधा भक्ति का सन्देश दिया और सीता खोज में शबरी की सहायता मांगी। शबरी से मार्ग निर्देशन पाकर प्रभु राम चले गए। प्रभु दर्शन से तृप्त शबरी योगाग्नि में जल, परम धाम को चली गईं। इसी के साथ नाटक शबरी की प्रतीक्षा का अंत हुआ।