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सरकारी संवेदनहीनता की भेंट चढ़ी नवजात.. देखें पूरा मामला!

समय पर ऑक्सीजन मिल जाती हो बच सकती थी जान

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भोपाल। हमीदिया अस्पताल के डॉक्टरों की संवेदनहीनता और आधे-अधूरे संसाधनों ने एक और नवजात की बलि ले ली। गत दिवस ऑक्सीजन नहीं मिलने से एक दिन की नवजात की मौत हो गई। अगर अस्पताल के स्टाफ ने जरा सी भी सजीदगी दिखाई होती तो उस मासूम की जान बचाई जा सकती थी। बच्ची के पिता जितेन्द्र मालवीय का कहना है उन्हें बच्ची को बिना ऑक्सीजन तीन मंजिल तक ले जाना पड़ा जिससे उसकी तबीयत और बिगड़ गई और मासूम की जान चली गई।

अस्पताल में भर्ती मां पूछ रही ‘लाडो’कैसी है

24 घंटे सांसों के लिए संघर्ष करने के बाद मासूम अब इस दुनिया में नहीं रही, लेकिन सिविल हॉस्पिटल बैरागढ़ में भर्ती उसकी मां को इंतजार है कि उसकी बेटी फिर से उसकी गोद में आएगी। परिजन उसे बताने की हिम्मत नहीं कर पा रहे क्योंकि वो बार-बार एक ही सवाल कर रही है कि मेरी ‘लाडो’कब आएगी। पवित्रा की यह दूसरी बेटी है। जितेन्द्र ने बताया कि हम पवित्रा के सामने जाने की हिम्मत तक नहीं कर पा रहे हैं। वो हमसे एक ही सवाल पूछती है, लेकिन हमारे पास सिवाय झूठ बोलने के दूसरा उपाय नहीं है। जब तबीयत थोड़ी ठीक हो जाएगी तक उसे सच बताएंगे।

भर्ती कराने एक घंटे तक खड़ी रही एंबुलेंस

बच्ची को बैरागढ़ सिविल अस्पताल से लेकर आई एंबुलेंस एक घंटे तक कमला नेहरू अस्पताल बिल्डिंग के गेट पर खड़ी रही, लेकिन हमीदिया के शिशु रोग वार्ड से कोई भी वार्ड बॉय या नर्स बच्ची को लेने नीचे एंबुलेंस तक नहीं आया। जबकि एंबुलेंस का ईएनटी स्टाफ का एक सदस्य खुद ऊपर जाकर बताकर आया कि सीरियस केस आया है, थोड़ा जल्दी कीजिए। इसके बावजूद किसी जिम्मेदार ने ध्यान नहीं दिया।

पिता को ही ले जाना पड़ा वार्ड में

जब एक घंटे तक शिशु वार्ड से कोई कर्मचारी बच्ची को रिसीव करने नहीं आया तब मजबूरन उसके पिता ने अपनी बच्ची को गोद में लिया और सीढिय़ों से तीसरी मंजिल तक ले गया। इस दौरान ही बच्ची की हालत बिगड़ गई थी। इतना ही नहीं एसएनसीयू में बेड खाली न होने के कारण बच्ची को वेंटीलेटर पर भर्ती किया गया, लेकिन इससे भी फायदा नहीं हुआ और शुक्रवार सुबह छह बजे उसकी मौत हो गई।

एंबुलेंस में थी ऑक्सीजन

जो एंबुलेंस बच्ची को लेकर आई थी, उसमें तो ऑक्सीजन की व्यवस्था थी, लेकिन हमीदिया अस्पताल के पास मूवेबल ऑक्सीजन सिलेंडर ही नहीं है। एंबुलेंस से शिशु वार्ड तक बच्ची बगैर ऑक्सीजन सपोर्ट के पहुंची। यही अवधि जान पर भारी पड़ गई।

अस्पताल प्रशासन की कोई गलती नहीं है। तय मेडिकल प्रोटोकॉल है, उसका पालन किया गया है। बच्ची की मौत पर मुझे भी दुख है। फिर भी मैं दिखवाउंगा कि चूक कहां और किससे हुई।
-डॉ. एमसी सोनगरा, डीन जीएमसी

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