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पहली बार 1936 के ओलंपिक में भोपाल के दो ओलंपियनों ने जीता था गोल्ड

भारतीय हॉकी के वर्चस्व में भोपाल की हॉकी का अहम योगदान

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बर्लिन ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम।

बर्लिन ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम।

भोपाल। ओलंपिक शब्द सुनकर ही हमें देश का हॉकी गोल्डन टाइम याद आ जाता है। जब ओलंपिक खेलों में भारत का वर्चस्व था। 1928 के एम्स्टर्डम ओलंपिक से शुरू हुआ भारतीय हॉकी का सुनहरा सफर 1956 के मेलबोर्न ओलंपिक तक बेरोकटोक चला। 116 वर्षों के ओलंपिक इतिहास में भारत के खाते में सिर्फ 18 पदक आए हैं और इनमें से 11 हॉकी में जीते हैं। देश ने हॉकी में आठ स्वर्ण, एक रजत और दो कांस्य पदक जीते हैं। 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक में भारत ने पहली बार स्वर्ण जीता। भारत के इस सुनहरे दौर में भोपाल की हॉकी का भी अहम योगदान रहा है।

भोपाल के हॉकी ओलंपियन
अहमद शेर खान - 1936 बर्लिन ओलंपिक
इनामुर रहमान - 1968 मैक्सिको ओलंपिक
असलम शेर खान - 1972 और 1976 ओलंपिक
सैयद जलालउद्दीन - 1984 लास एंलेजिस
समीद दाद - 2000 सिडनी ओलंपिक

बंटवारे के पहले ये दोनों ही भोपाल से ओलंपिक में गोल्ड जितने वाले खिलाड़ी हैं

उस सुनहरे दौर को याद करते हुए 1972 और 1976 ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा रहे भोपाल के असलम शेर खान बताते हैं कि ओलंपिक में भारतीय हॉकी के वर्चस्व में भोपाल का भी अहम योगदान रहा है। जब हमने ब्रिटिश इंडिया के बैनर तले 1936 बर्लिन ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता था तब भोपाल के दो खिलाड़ी भी इस टीम का हिस्सा रहे थे। वे हैं अहमद शेर खान और ऐशल मोहम्मद खान। बंटवारे के पहले ये दोनों ही भोपाल से ओलंपिक में गोल्ड जितने वाले खिलाड़ी हैं।

गोल्ड जीतने पर बनाया चीफ कोच

अहमद शेर खान के बेटे असलम शेर खान बताते हैं कि पिता भोपाल वांडर्स और इंडिया टीम से पावर लाइन में राइट आउट की पोजिशन पर हॉकी खेलते थे। गोल्ड मेडल जीतने के बाद उन्हें 1956 में मप्र स्कूल हॉकी टीम का चीफ कोच बनाया गया था, जब मप्र स्कूल की टीम जूनियर नेशनल स्कूल गेम्स के हॉकी में 1966 तक चैंपियन रही थी। वे शहर के सिकंदरिया और एलेक्जेंडरिया मैदान में हॉकी खेलते थे। फिर वर्ष 1930 में भोपाल हॉकी एसोसिएशन बनी और औबेदुल्ला गोल्ड कप शुरू हुआ।

हमारी ताकत नेचुरल ग्रास की हॉकी रही
असलम शेर खान कहते हैं कि हमारी ताकत नेचुरल ग्रास की हॉकी रही है। अब ये आर्टिफिशियल सर्फेस पर खेली जाने लगी। जिसमें भारतीय खिलाड़ी ज्यादा तेजी नहीं दिखा पाते। भारत के पास ड्रेवलिंग और शॉर्ट पासेस नुमाया था। यही हमारी ताकत थी। इस दौर में कई खिलाड़ी पैदा हुए जो यूरोपियन टीम को छकाकर गोल करते थे। वो हिट और रन पावर गेम आज के दौर में खो सा गया है। आज का दौर स्पीड, पावर और स्टेमिना का है। 70 मिनट में आर्टिशियल सर्फेस पर ताकत बनाए रखने में हम बहुत पीछे हैं।

अब खेल सिर्फ पैसों का रह गया है
1984 लास एंलेजिस ओलंपिक में भारतीय हॉकी के सदस्य रहे सैयद जलालउद्दीन बताते हैं कि पहले लोग देश के नाम के लिए ही खेलते थे, लेकिन आज का समय पैसे का रह गया है। पहले शहर में हॉकी के 100 से ज्यादा क्लब थे, अब दो-चार बचे हैं। देश में भी हॉकी के 100 से ज्यादा टीमें होती थीं, लेकिन ये भी 12 ही बची हंै।

इन्हीं टीमों से ही अच्छे खिलाड़ी निकल पाते हैं। वहीं ये टीमें भी उसी टूर्नामेंटों में खेलती नजर आती हैं जिसमें ईनामी राशि ज्यादा होती है। अन्य खेलों की तुलना में हॉकी के खिलाडिय़ों को कई विभागों में नौकरी नहीं दी जा रही है। जिससे हॉकी गर्त में जा रही है। इस खेल को बढ़ावा मिलना चाहिए।

1968 मैक्सिको ओलंपिक में भारतीय टीम के सदस्य रहे इनामुर रहमान कहते हैं कि आज जो गेम, रूल्स और ग्राउंड हैं उससे आप सोच नहीं कर सकते कि कौन जीतेगा। हॉकी का ट्रेंड बदल चुका है। अब पहले जैसी हॉकी नहीं रही। ये फास्ट हो गई है। पहले ग्रास मैदान में हॉकी होती थी तब खिलाड़ी स्लो गेम खेलते थे।

लेकिन अब एक्ट्रो टर्फ में गेंद तेजी से भागती, खिलाडिय़ों को भी तेज हॉकी खेलनी पड़ती है। जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, नीदरलैंड ताकतवर टीमें हैं। इनके खिलाडिय़ों में स्टेमना भरपूर है। उनका गेंद में कंट्रोल और स्टोपेज बहुत हार्ड है। इस कारण ओलंपिक में भारतीय हॉकी पदक जीतने के लिए तरस रही है।

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