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वन मंत्री विजय शाह ने दिया था महंगे छाते खरीदी का सुझाव, निजी कंपनियों को होता 10 करोड़ का फायदा

मुख्यमंत्री चरण पादूका योजना(mukhyamantri charan paduka yojana) में बाजार भाव से महंगे छाते बेचना चाहते थे निजी बिडर, सांगगांठ कर प्रक्रिया में सभी ने एक जैसे 190 रुपए ही रेट डाले

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भोपाल। मुख्यमंत्री चरण पादूका योजना(mukhyamantri charan paduka yojana) के तहत प्रदेश के 15.24 लाख तेंदूपत्ता संग्राहकों को जूता-चप्पल, साड़ी, पानी की बोतल और छाता वितरण पर करीब 261 करोड़ रुपए खर्च किए। छाता वितरण के लिए सरकार ने ऐन मौके पर 200 रुपए की राशि संग्राहकों के खाते में जमा करने का फैसला लिया, लेकिन इसके पीछे कुछ अधिकारियों का दबाव भी रहा। जिन्होंने महंगे छातों की खरीद रोक दी। यदि मंत्री की सिफारिश मान ली जाती तो राज्य लघु वनोपज संघ को करीब 10 करोड़ का नुकसान होता।

राज्य लघु वनोपज संघ ने योजना के तहत छाता वितरण के लिए मार्च में पहली निविदा जारी की थी। इसमें करीब 10 कंपनियों ने हिस्सा लिया, लेकिन कोई भी सफल नहीं हो पाया। मई में दूसरी बार टेंडर जारी किया गया, जिसमें करीब 246 रुपए का रेट मिला। रेट ज्यादा होने पर खरीदी के लिए बनाई गई लघु उद्योग निगम की कमेटी ने तीसरी बार टेंडर जारी किया तो रेट घटकर 209 रुपए हो गया। तीसरी बार में तीन कंपनियां इसमें सिलेक्ट की गई। कमेटी से जुड़े अफसरों ने जब मार्केट सर्वे कराया तो निविदा करने वाली एक कंपनी का वही छाता सिर्फ 140 रुपए में मिल रहा था।

आचार संहिता का दिया हवाला

कमेटी ने स्नैप बिडिंग की गई तो तीनों कंपनियों ने चार ग्रुप बनाकर 190 रुपए का रेट डाला। बोर्ड के एमडी ने अपनी टिप में प्राप्त दर को अधिक बताते हुए शासन से मार्गदर्शन मांगा। इसमें लिखा गया कि तीन माह में अब प्रक्रिया को पूरा कर पाना संभव नहीं होगा और आचार संहिता लग जाएगी। मंत्री ने टिप लिखी कि विभाग का नाम छातों पर लिखा जाए और 200 प्लस जीएसटी से कम दर है तो आदेश देकर 60 दिन में कार्यवाही पूरी की जाए।

खरीदी होती तो वितरण ही नहीं हो पाता

प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि बाजार में जो छाता न्यूनतम 145 रुपए प्रति नग में मिल रहा था, वह इतने ऑर्डर पर 120 से 130 रुपए तक आसानी से मिल जाता। यदि जुलाई में ऑर्डर जारी किए जाते तो अगस्त अंत तक छाते मिल पाते। नियमानुसार 15 दिन प्री डिलेवरी टेस्टिंग और 15 दिन पोस्ट डिलेवरी टेस्टिंग के लिए होते हैं। ऐसे में अक्टूबर में आचार संहिता से पहले वितरण का काम शुरू नहीं हो पाता। लघु उद्योग निगम ने इस सिफारिश को नहीं माना।

मैंने नहीं की सिफारिश
वन मंत्री से जब पत्रिका ने नोट शीट के बार में पूछा तो मंत्री ने नोट शीट लिखने से साफ इंकार कर दिया, बोले जो किया अफसरों ने ही किया। मैंने तो कोई नोटशीट ही नहीं लिखी। वहीं, राज्य लघु वनोपज संघ के प्रबंध संचालक पुष्कर सिंह का कहना है कि मुख्यमंत्री चरण पादुका योजना का काम पूरा हो जाने पर वन सलाहकार भागवत सिंह की सेवाएं समाप्त कर दी गई। योजना से जुड़े किसी मामले में मैं टिप्पणी नहीं करूंगा।

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