
चॉकलेट खाने की उम्र में जुबां को मिला कड़वी दवाइयों का स्वाद
बीकानेर. संभाग के सबसे बड़े पीबीएम अस्पताल में यूं तो हर मर्ज के रोगी और उनके परिजन आते रहते हैं। लेकिन एक कोना ऐसा भी हो, जो अनदेखा-अनजाना सा तो लगता है, लेकिन इसमें एक अलग सी उदासी नजर आती है। हालांकि, यहां मौजूद चिकित्सक और स्टाफ माहौल को हल्का-फुल्का रखते हुए मरीज और उसके अभिभावक को सहज करने की कोशिश करते दिखते हैं, लेकिन कई बार छोटे बच्चों के मासूम सवाल उन्हें असहज ही नहीं, निरुत्तर भी कर जाते हैं। हम बात कर रहे हैं अस्पताल के एंटी रिट्रो वायरल प्लस सेंटर (एआरटी) की, जहां एड्स पीडि़तों का इलाज किया जाता है। इनमें एक बड़ी संख्या बच्चों की होती है, जो माता-पिता अथवा अभिभावकों के साथ दवा लेने आते हैं। कई बार चिकित्सकों के मासूम सवाल चिकित्सकों को भी असहज करते हैं। हालांकि, संयत रहते हुए बच्चों की बात को सावधानी पूर्वक सुन कर चिकित्सक उसकी काउंसलिंग करने की कोशिश करते हैं।
... डॉक्टर अंकल मेरी दवा कब छूटेगी
डॉक्टर अंकल मेरी यह दवा कब छूटेगी और मैं कब पूर्ण रूप से स्वस्थ होकर खेलने-कूदने लगूंगा। अगर छूटेगी नहीं, तो कम तो हो जाएगी। मुझे दवा खाने में बहुत अजीब लगता है। यह संवाद किसी सीरियल अथवा नाटक के नहीं हैं। एड्स सेंटर में आने वाले अधिकांश छोटे बच्चों के हैं, जिन्हें दवा या बीमारी दोनों का ही मतलब कई बार मालूम नहीं होता। टॉफी तथा बिस्किट खाने की उम्र में एड्स-एचआइवी पीडि़त यह बच्चे सुबह-शाम दवा खा रहे हैं। अगर कोई इनसे बीमारी के बारे में पूछ भी ले, तो वे आंखों को इधर-उधर घुमाने लगते हैं और साथ आए अभिभावकों की तरफ देखने लगते हैं।
एआरटी सेंटर में 85 बच्चे पंजीकृत
एड्स की काउंसलिंग तथा इलाज कराने के लिए अस्पताल में एआरटी सेंटर खुला हुआ है। यहां पर अलग से पर्ची कटती है और दवाइयों के लिए भी अलग से काउंटर है। जांच आदि की सुविधा भी अलग है। सेंटर में इस समय 85 बच्चे पंजीकृत हैं, जो समय-समय पर आकर दवा लेते हैं। इन बच्चों की उम्र डेढ़ साल से लेकर 14 साल तक की है।
कैसे चलता है पता
आमतौर पर एचआइवी पीडि़त मां-बाप के इन बच्चों के डेढ़ माह का होने पर उसकी जांच की जाती है। डीबीटी टेस्ट में रिपोर्ट का पता चलता है। अधिकांश जिस बच्चे की माता एचआइवी-एड्स पीडि़त होती है, उस बच्चे में रिपोर्ट पॉजिटिव आने की संभावना अधिक रहती है। पॉजिटिव रिपोर्ट आते ही दवा शुरू हो जाती है, जो जिंदगी भर खानी पड़ती है।
वजन के अनुसार दवा की सलाह
एड्स पीडि़त बच्चे को वजन के अनुसार दवा लेने की सलाह दी जाती है। दिन में दो बार दवा लेनी होती है। इस प्रकार के बच्चे को तीन स्तर की दवा दी जाती है। पहले स्तर की दवा से कोई राहत नहीं मिलने पर उसे दूसरे स्तर की दवा लेने की सलाह दी जाती है। अगर इससे भी कोई राहत नहीं मिले, तो दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के चिकित्सकों के पास भेजते हैं। वे तीसरे स्तर की दवा लेने की सलाह देते हैं।
माता के संक्रमित होने पर खतरा ज्यादा
अगर माता एड्स पीडि़त होती है, तो उसके बच्चे को संक्रमण होने का खतरा ज्यादा रहता है। इस वजह से पीडि़त माता के बच्चा पैदा होने पर उसकी एचआइवी-एड्स की जांच कराना आवश्यक होता है। एड्स पीडि़त बच्चों को समय पर दवा देना भी आवश्यक है।-डॉ. बीएल मीणा, नोडल अधिकारी एआरटी सेंटर, पीबीएम अस्पताल
Published on:
17 Jan 2023 02:50 am
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