
बीकानेर. शब्द व्यक्ति के मन के भावों को अभिव्यक्त करते हैं। एक-दूसरे से संवाद का जरिया भी शब्द ही होते हैं। लेकिन दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जो अपने मन के भावों को न शब्दों से अभिव्यक्त कर सकते हैं और न ही किसी दूसरे के कहे शब्दों को सुन ही पाते हैं। इनकी अपनी अलग ही दुनियां होती है। अपनी मस्ती में मगन, धुन के पक्के और जीवन में कुछ कर गुजरने का जज्बा इनमें कूट- कूट कर भरा होता है। अपनी कमियों की ओर ध्यान न देकर कैसे जीवन में आगे बढ़ें, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण मिल रहा है बीकानेर में चल रहे मूक-बधिर बच्चों के स्किल डेवलपमेंट कोर्स में। इसमें देशभर से आए एक हजार से अधिक बच्चे और युवा न केवल स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण ले रहे हैं, बल्कि अपनी कला अभिव्यक्ति और हुनर में भी निखार ला रहे हैं।
साइन लैंग्वेज है सेतु
जिनमें जन्म से सुनने और बोलने की कमी रही है, उनके लिए साइन लैंग्वेज ही आपसी संवाद का एकमात्र जरिया है। प्रशिक्षण स्थल पर इशारों ही इशारों में चलने वाली इनकी बातचीत और भावाभिव्यक्ति न केवल अनूठी है, बल्कि इनके अल्हड़पन, मस्ती, धुन और अपनी अलग ही दुनिया की हम सबको सैर सी कराती है।
ट्रेनिंग में गंभीर, नृत्य और खेल भी...
नोखा रोड डागा गेस्ट हाउस में महावीर इंटरनेशनल सर्विस ऑर्गेनाइजेशन और अन्य संस्थाओं के सहयोग से मूक-बधिर युवाओं का स्वरोजगार प्रशिक्षण शिविर चल रहा है। शिविर के मुख्य संयोजक लोकेश कावड़िया के अनुसार बच्चे अपनी पसंद के क्षेत्र में ट्रेनिंग ले रहे हैं। जितनी गंभीरता इनकी ट्रेनिंग में नजर आती है, उतनी ही मस्ती इनके खेल, नृत्यों में भी होती।
हर शब्द का अपना एक अलग साइन
राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षिका सुनीता गुलाटी बताती हैं कि मूक बधिर बच्चों में सीखने और कुछ करने का अलग जज्बा होता है। ये प्रतिभाशाली और मेहनती होते हैं। इशारों से ही बात करते हैं। हर शब्द का अपना एक अलग साइन होता है।
लंबी चर्चाएं और संवाद
सामान्य व्यक्ति के समूह में जिस प्रकार हंसी मजाक, विषय चर्चा का दौर चलता है। उसी प्रकार साइन लैंग्वेज में इन मूक बधिर बच्चों-युवाओं की लंबी चर्चाएं और संवाद का दौर बरबस ही अपनी ओर खींचता है। इस दौरान उनके हंसने, रूठने, मनाने, गुस्से, चुहलबाजी, विषय की गंभीरता की समझ इनके हाव-भाव में नजर आ जाती है। नेशनल एसोसिएशन ऑफ डी डेफ की महिला विंग की सचिव प्रीति सोनी बताती हैं कि मूक बधिर बच्चों के मन के भावों को समझना जरूरी है। ये कहने में नहीं हिचकते, बस इसको समझने वालों की जरूरत होती है।
Published on:
02 Oct 2024 11:42 pm
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