
छत्तीसगढ़ का रण : सबके हिस्से में विकास, हमारे जिम्मे धूल, धुआं और राख...
बिलासपुर. Chhattisgarh assembly election 2023 : पेड़ की शाखों पर चढ़ी काली परत, सड़क पर काली धूल की मोटी चादर और उसी सड़क पर गुजरती तीन से चार महिलाएं अपने आंचल को ही मास्क बनाकर अपने गंतव्य की ओर चली जा रही थीं, उनकी नजर कभी सड़क पर होती तो कभी धुआं उगलती उद्योग की चिमनियों पर जो सड़क के ठीक बाजू में ही थीं। दरअसल ये इलाका उद्योग और खदानों की नगरी तमनार का है। थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर हुंकराडीपा चौक आया जहां 15 से 20 गांव के सौ के आसपास या फिर ज्यादा ही ग्रामीण टेंट लगाकर आर्थिक नाकेबंदी का नारा देकर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे। सामने की सड़क पर चार से पांच बड़े टायर रखकर मार्ग को अवरुद्ध कर दिया गया था, सड़क के दोनों ओर अतिकाय वाहनों की कतार खड़ी थी। किसी की हिम्मत नहीं थी कि ग्रामीणों द्वारा खिंची गई लक्ष्मणरेखा को लांघ जाए। बीच-बीच में हमारी मांगे पूरी करो के नारे भी गूंज रहे थे। ये वो मांगें थी जो लंबे समय से चली आ रही थीं पर राजनीतिक नहीं थी।
हम विकास को भुगत रहे हैं
धरने पर बैठे ग्रामीणों से जब मुद्दों को लेकर बात शुरू हुई और विकास का जिक्र आया तो जैसे वो भड़क गए थे उन्होंने कहा कि आप बिलासपुर से आए हो आप विकास को भोग रहे हो लेकिन इस विधानसभा में हम विकास को भुगत रहे हैं। हर सप्ताह, हर माह इसी सड़क पर इन भारी वाहनों के कारण किसी न किसी घर का कोई चिराग बुझ रहा है, हादसे में मौत हमारे जीवन का हिस्सा बन गया है। आपकी बात सही है कि चिमनी जलती है तो देश चलता है लेकिन यहां जब चिमनी जलती है तो हमारी सांस फूलती है। खदानों में जब धमाका होता है तो हमारी दीवार दरकती है। इस बरगद को देखिए और बताइए कौन सा पत्ता हरा दिख रहा है विकास के नाम पर हमारी किस्मत में धूल, धुआं और राख थोप दिया गया है।
लूट मची है जमीन की
आंदोलनरत ग्रामीणों का कहना था कि यहां खदान और उद्योग के नाम पर जमीनों की लूट मच गई है। आदिवासी जमीन औने-पौने दाम पर खरीदी जा रही है इसके बाद उसपर निर्माण हो जा रहा है ताकि अधिग्रहण में उसकी कीमत ज्यादा मिले। ऐसे एक दो नहीं कई मामले हैं, इसकी शिकायत करके हम हार चुके हैं कोई सुनवाई नहीं हो रही है। अधिकारी, नेता, पक्ष-विपक्ष कोई हमारे साथ नहीं है, क्योंकि इस खेल में इनकी भी हिस्सेदारी है।
जनप्रतिनिधि तो साथ होंगे...
जब सामाजिक कार्यकर्ता सविता रथ से पूछा गया कि ग्रामीणों की परेशानी में आपके जनप्रतिनिधि तो साथ होंगे... आपका साथ देने आते होंगे... उनका कहना था कि हां आते हैं ना जब कहीं गम्मत होता है, नाचा होता है, कोई धार्मिक आयोजन होता है तो फीता काटने आते हैं। जब मुद्दे की बात आती है और उसमें कोई उद्योग या खदान शामिल हो तो शांत हो जाते हैं, हमें अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है।
विकास के रोग से जूझ रहे हम
मुद्दों को जब थोड़ा और कुरेदने की कोशिश की गई तो आक्रोश का मवाद सामने आ गया। राजेश गुप्ता ने बताया कि सराईपाली गांव में सिलिकोसिस(ऑक्यूपेशनल डिजीज) से लोग मर रहे हैं कोई सुनवाई नहीं हो रही। खदान प्रभावित गांव उरबा के अस्पताल में कोई बुनियादी सुविधा नहीं है। देलारी गांव में खेतों में केमिकल युक्त पानी छोड़ा जा रहा है खेत बर्बाद हो रहे हैं पर शिकायत के बाद भी किसी को फर्क नहीं पड़ता है।
रोजगार तो मिला होगा...
एक अहम मुद्दे रोजगार पर जब ग्रामीणों को टटोलने की कोशिश की गई तो उनका सपाट जवाब था कि यहां 60 से ज्यादा कंपनियां है। आप गांव-गांव में घूमकर देख लीजिए कितनों को रोजगार मिल गया, यदि किसी को मिला भी तो वो मजदूर ही बना। हमारी जमीन उद्योग और खदान में चली गई और हम जमीन के मालिक से मजदूर बन गए।
देश के लिए अहम है ये इलाका
दरअसल रायगढ़ जिले के लैलूंगा विधानसभा क्षेत्र का तमनार, अपने पावर प्लांट और कोयला खदानों के लिए पूरे देश में विख्यात है। ये वो हिस्सा है जो देश को न सिर्फ रोशन करता है बल्कि देश के उद्योगों में अपने ईंधन की आग फूंकता है, साथ ही ये वो इलाका है जहां से ग्रामीणों ने हमारी जमीन हमारा कोयला का नारा देकर देश के पहले कोयला सत्याग्रह की शुरुआत की है।
Published on:
01 May 2023 03:33 pm

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