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धान की बढ़ रही कीमत, लेकिन पोहा मिलें बंद होने की कगार पर

यह समस्या इसलिए हो रही है, क्योंकि अन्य उत्पादक राज्यों में पोहा की कीमत यहां से कम है। इसके अलावा वहां धान की खरीदी समर्थन मूल्य पर नहीं होती है।

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बिलासपुर. धान की बढ़ती कीमत और पोहा में घटती मांग के कारण पोहा मिलें परिचालन से बाहर होने की कगार पर हैं। भाटापारा पोहा मिल एसोसिएशन के संरक्षक कमलेश कुकरेजा ने बताया कि यह समस्या इसलिए हो रही है, क्योंकि अन्य उत्पादक राज्यों में पोहा की कीमत यहां से कम है। इसके अलावा वहां धान की खरीदी समर्थन मूल्य पर नहीं होती है।

जिले में छोटी-बड़ी मिलाकर लगभग 180 पोहा मिलें संचालित हो रहीं हैं। इनमें लगभग 20 हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष श्रमिकों को काम मिल रहा है, इनकी नौकरी भी अब संकट में नजर आ रही है। बताया गया कि पहले पोहा का उत्पादन हाथों से किया जाता था। फिर मांग बढ़ी, तो मशीनें आईं और इस क्षेत्र में और भी नई तकनीक ने प्रवेश किया।
इसी समय पोहा यूनिटों की स्थापना का काम तेजी से बढ़ा था। इसके बाद से पोहा मिल बढ़ते गए, जहां दूसरे जिलों में भी अवसर देखकर पोहा मिलें खोली गईं। लेकिन अब ये सभी संकट में आ चुके हैं। पोहा मिलर्स के संरक्षक ने बताया कि उत्पादक राज्यों की बढ़ती संख्या और स्थानीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा के बीच अब धान की हर साल बढ़ती कीमत की वजह से नियमित संचालन में समस्याएं हो रही हंै। अब इस साल एक एकड़ से 20 क्विंटल धान 2800 रुपए करीब होने जा रहा है। इस वजह से जो धान उन्हें किसानों से मिलता था, वह अब नहीं मिल पाएगा। इधर लागत व्यय हर साल बढ़ रहा है। जबकि उत्पादन की कीमत स्थिर है, तो उपभोक्ता राज्यों के साथ घरेलू मांग भी लगातार गिर रही है। ऐसे में अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। विकल्प दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहा।

भाटापारा का देश में था नाम
मिल संचालक ने बताया कि 70 के दशक में शुरू हुए पोहा उद्योग के लिए वर्ष 2010 से 2020 तक का समय एक तरह से स्वर्ण युग माना जा सकता है, क्योंकि भाटापारा के पोहा उद्योग को देश स्तर पर पहचान मिली। यही वह ऐसा दशक था, जब इस क्षेत्र में मध्यप्रदेश और गुजरात जैसे नए प्रतिस्पर्धी राज्य आए। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भी ऐसा ही माहौल बना। अब संकट द्वार पर आकर खड़ी हो चुकी है। अब क्या किया जा सकता है। इसका विकल्प देखा जा रहा है।

इन पर भी संकट मडरा रहा
जिले में संचालित पोहा मिलों में लगभग 20 हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष श्रमिकों को काम मिल रहा है। तैयार उत्पादन में पर्याप्त मांग नहीं निकलने से ये श्रमिक भी संकट में हैं, क्योंकि मिलों का संचालन नियमित नहीं हो पा रहा है। स्थिति इतनी विकट है कि कहीं काम के घंटे कम किए जा रहे हैं, तो कहीं उत्पादन कम करने जैसे फैसले समस्याओं की वजह से लिए जाने लगे हैं। लिहाजा इन श्रमिकों की रोजीरोटी पर बन आई है।
प्रतीक्षा प्रोत्साहन नीति की


&पूंजीगत समस्या, बढ़ती लागत, घटती मांग को ध्यान में रखते हुए सरकार से आग्रह है कि ऐसी प्रोत्साहन नीति बनाई जाए, जिससे प्रदेश के पोहा उद्योगों को राहत मिल सके।
कमलेश कुकरेजा, संरक्षक, पोहा मिल एसोसिएशन, भाटापारा