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निर्जीव चीजों से बेइंतहा प्यार तो नहीं?

ऑब्जेक्टम सेक्सुएलिटी के शिकार लोग निर्जीव वस्तु से जुड़ी कहानियां बुनते हुए फंतासी दुनिया में जीते हैं और इन्हें आभासी दुनिया...

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Mukesh Kumar Sharma

Jul 19, 2018

 living things

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ऑब्जेक्टम सेक्सुएलिटी के शिकार लोग निर्जीव वस्तु से जुड़ी कहानियां बुनते हुए फंतासी दुनिया में जीते हैं और इन्हें आभासी दुनिया में सुकून मिलता है।

ऑब्जेक्टम सेक्सुएलिटी

कभी-कभी लोग गुडिय़ा, कम्प्यूटर, टेडी बियर या किसी भी निर्जीव वस्तु के साथ बेहद जुड़ाव महसूस करने लगते हैं और किसी भी हाल में उन चीजों से अलग नहीं होना चाहते। ऐसे लोग ऑब्जेक्टम सेक्सुएलिटी रोग से पीडि़त होते हैं।

आ पको जानकर ताज्जुब होगा कि कई महिलाएं और पुरुष निर्जीव वस्तुओं से दीवानेपन की हद तक प्यार कर बैठते हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. संजय गर्ग के पास ऐसे तीन मामले आ चुके हैं।

इन दिनों वे प्रमिला बैनर्जी (नाम परिवर्तित) की काउंसलिंग कर रहे हैं। एमबीए डिग्रीधारी 24 वर्षीय प्रमिला ऑफिस में अच्छा परफॉर्मेंस दे रही हैं। मध्यमवर्गीय परिवार की सदस्य प्रमिला की शादी माता-पिता ने चार्टेड अकाउंटेंट अंशुमान से तय कर दी। प्रमिला अंशुमान से मिलने पहली बार डेट पर गई तो अपने साथ एक गुडिय़ा ले गईं।

यह गुडिय़ा प्रमिला के पास बचपन से है। जिसे वह स्कूल, कॉलेज के बाद अब ऑफिस भी ले जाती हंै। अंशुमान ने प्रमिला के पास गुडिय़ा देखी, तो उसे हंसी आ गई। उसने गुडिय़ा की प्रशंसा की तो प्रमिला का चेहरा खिल उठा। अगली डेट में भी फिल्म देखते वक्त वह गुडिय़ा से बात करने में व्यस्त दिखी। शादी के बाद यह गुडिय़ा दोनों के बीच तकरार की वजह भी बन गई।

उपेक्षा है बड़ी वजह

डॉ. संजय गर्ग कहते हैं ऑब्जेक्टम सेक्सुएलिटी बचपन में हुई उपेक्षा, दुत्कार और रूखे व्यवहार से उपजती है। जब अभिभावक बच्चे को किसी भावनाहीन और निर्जीव वस्तु की तरह ट्रीट करते हैं तो उनका खिंचाव निर्जीव चीजों की ओर बढ़ जाता है। काउंसलिंग, ट्रॉमा थैरेपी और मेडिकेशन के जरिए इस बीमारी का उपचार किया जाता है।

साथ ही घरवालों को चाहिए कि वे इनकी भावनाओं को समझें और व्यवहार में नर्मी बरतें। डॉ. अमरनाथ मल्लिक के मुताबिक इसके रोगी निर्जीव वस्तु को अपना प्रेमी मान बैठते हैं।