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रासायनिक बदलाव के कारण मन मेें आता है सुसाइड का करने का विचार

आत्महत्या का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है लेकिन शोध के नतीजों के आधार पर इसके मामले कम किए जा सकते हैं।

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Vikas Gupta

Nov 21, 2017

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आत्महत्या का पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है लेकिन शोध के नतीजों के आधार पर इसके मामले कम किए जा सकते हैं।

आत्महत्या या सुसाइड एक ऐसा शब्द है जिसकी सोच मात्र से दिमाग में तीव्र गति से रासायनिक प्रक्रिया में बदलाव होकर नकारात्मक सोच पैदा हो जाती है। शोध के अनुसार कुछ लोगों में इसका पूर्वानुमान लगातार उन्हें बचाया जा सकता है। जो व्यक्ति लंबे समय से मानसिक बीमारी, नशे की लत या असहनीय घटना से पीडि़त है उनके व्यवहार में परिवर्तन दिखे तो सावधान हो जाएं।

ये हैं आत्महत्या करने के लक्षण

अात्महत्या करने वाला व्यकि्त बार-बार कीटनाशक दवाइयों के बारे में पूछता है। घर के सदस्यों से बात बंद कर देता है, खाने से दूरी बना लेता है,व्यक्ति निराशाजनक बातें करने लगता है। आगर किसी व्यकि्त में एेसे लक्षण दिखे तो उस पर नजर रखें। ऐसी स्थिति में आशंकित व्यक्ति से सकारात्मक संवाद करें ताकि गलत कदम को रोका जा सके।
न्यूरोट्रांसमीटर जिम्मेदार
न्यूरो साइंटिस्ट क्राउले और बोरली ने मृत्यु के बाद दिमाग में होने वाली रासायनिक प्रक्रियाओं का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जिन्होंने आत्महत्या की उनके मस्तिष्क में न्यूरोट्रांसमीटर की मात्रा सर्वाधिक थी। जबकि सामान्य व्यक्ति के मस्तिष्क में इस न्यूरोट्रांसमीटर की मात्रा न के बराबर होती है। ये न्यूरोट्रांसमीटर निर्णय लेने की क्षमता को खत्म कर नकारात्मक सोच को पैदा कर आत्महत्या करने के लिए विवश कर देते हैं। ऐसे में इनके प्रति नरम स्वभाव रखकर सुसाइड के मामले रोके जा सकते हैं।
30 प्रतिशत युवाओं की मृत्यु का कारण आत्महत्या है।
नशे की लत से ग्रसित 15-20 प्रतिशत व्यक्तियों में आत्महत्या की आशंका रहती है।

भारत मेें अधिकतर इन कारणों से आत्महत्या करते हैं लोग

घरेलू हिंसा

घरेलू हिंसा भारत में आत्महत्या के मुख्य कारणों में से एक है। इस तरह के मामलों में ज्यादातर महिलाएं ही आत्महत्या की शिकार होती हैं। लगातार तनाव और अशांति का कारण अवसाद और अंत में आत्महत्या की ओर ले जाता है।

रिश्ते और पारिवारिक समस्याएं

युवाओं के बीच, यह आमतौर पर रिश्ते और प्यार में विफल रहने पर होता है, धोखाधड़ी और सम्बन्ध विच्छेद व्यक्ति को आत्महत्या की ओर ले जा सकता है। यहाँ तक कि विवाहित जोड़ों के लिए गलतफहमी, आपसी मतभेद और विश्वासघात भी आत्महत्या के कुछ कारण हैं। माता पिता, भाई बहन या साथी का अपमानजनक बर्ताव भी आत्महत्या के प्रयास के लिए योगदान करते हैं।
वित्तीय कारण

कर्ज का भुगतान करने में असमर्थता, काम की तलाश, परिवार का सहारा और बीमार माता पिता के मेडिकल खर्चों को पूरा करने में नाकाम रहना वह वित्तीय कारण है जो लोगों को आत्महत्या करने की ओर ले जाते हैं।
शिक्षा

भारत में छात्रों की आत्महत्या कोई अनोखी बात नहीं है। आमतौर पर इन आत्महत्याओं का कारण होता है दोस्तों से बेहतर प्रदर्शन करने की चाह और माता-पिता का मानसिक दबाव। छात्रों पर हमेशा ही अच्छे ग्रेड लाने और माता-पिता की अपेक्षाओं में खरा उतरने का दबाव रहता है, इसलिए जब वे किसी परीक्षा में असफल होते हैं तो अपना जीवन समाप्त करने का फैसला ले लेते हैं। इन आत्महत्या पीड़ितों का सामाजिक स्तर आमतौर पर मध्यम वर्ग या निम्न मध्यम वर्ग होता है, जिसमें माता पिता को बच्चों की शिक्षा के खर्च को पूरा करने के लिए पैसे उधार लेने पड़ते हैं या उन्हें अतिरिक्त काम करना पड़ता है।
मादक पदार्थों और शराब की लत

मादक पदार्थों का सेवन भारतीय समाज में सभी वर्गों को प्रभावित करता है। मादक द्रव्यों के सेवन से संबंधित आत्महत्याएं आम तौर पर मानसिक असंतुलन, काफी समय से चल रहा अवसाद, नशीली दवाओं के कारण मतिभ्रम, अधिक मात्रा में मादक पदार्थ लेना और अपनी लत को पूरा करने में वित्तीय असमर्थता के कारण होती हैं।
लाइलाज शारीरिक बीमारियां

भयानक शारीरिक बीमारियां जैसे कैंसर, एसटीडी और अन्य लाइलाज बीमारियों के कारण लोग आत्महत्या करते हैं।
मानसिक बीमारियों से पीड़ित

वर्ष 2014 में मानसिक बीमारियों से पीड़ित 7104 भारतीयों ने आत्महत्या कर ली। यहाँ तक की साक्षर लोग भी इन लक्षणों की अनदेखी करना चाहते हैं जो इससे भुगत रहे लोगों को आत्महत्या की ओर ले जाते हैं। निरक्षर लोगों का एक हिस्सा मानसिक बीमारियों को प्रेतात्मा के कारण मानता है और झाड़-फूंक से उपचार कराते हैं, जो पीड़ितों के लिए मददगार नहीं होता है और उन्हें आत्महत्या की ओर ले जाता है।