
land owners again landless
धर्मेन्द्र सिंह
छतरपुर। गरीब हरिजनों को जीवनयापन करने और उनके परिवार को पालने के लिए सरकार ने सरकारी जमीन के पट्टे 10 वर्ष के लिए बांटे थे। सरकार ने पट्टे इस मंशा से बांटे थे, कि भूमिहीन हरिजन परिवारों के सामने रोजी रोटी का संकट न रहे। इसलिए उन्हें सरकारी जमीन के पट्टे देकर भूमि मालिक बनाया गया। सरकार की इसी योजना के तहत जिला मुख्यालय से सागर कानपुर नेशनल हाइवे पर खौंप गांव के हरिजनों को वर्ष 1984- 85 और वर्ष 1998 से 2004 तकं शासन द्वारा 75 एकड़ जमीन के पट्टे बांटे गए सरकार से पट्टे पर जमीन मिलने से ये हरिजन भूमिहीन से भूमि मालिक तो बन गए, लेकिन ज्यादा दिन जमीन उनके पास नहीं रह पाई। नेशनल हाइवे के किनारे की बेशकीमती जमीन को शहर के रसूख और पैसे वालों ने हरिजनों से खरीद लिया। हरिजनों को उनके सरकारी पट्टे वापिस हो जाने का भय दिखाकर जमीन बेचने पर मजबूर किया गया। फिर राजस्व के नियमों को ताक पर रखकर बिना कलेक्टर की अनुमति लिए हरिजनों की पट्टे की जमीन खरीद ली गई। इस तरह से परिवार का गुजर बसर करने के लिए भूमि मालिक बनाए गए हरिजन एक बार फिर से भूमिहीन हो गए हैं।
ये है पूरा मामला
छतरपुर जिला मुख्यालय से सागर-कानपुर नेशनल हाइवे के किनारे बसे गांव खौंप (जिसे पहले देह कहा जाता था) के हरिजनों को परिवार पालने के लिए सरकारी जमीनों के पट्टे बांटे गए थे। राजस्व परिपत्र के नियमों और 1984 के राजस्व अधिनियम के संयुक्त मसौदे के अनुसार वर्ष 1984-85 में 21 हरिजन परिवारों को 45 एकड़ भूमि और वर्ष 1998 से 2005 के बीच 30 एकड़ जमीन, कुल 75 एकड़ जमीन के पट्टे दिए गए। सरकार से मिली जमीन पर हरिजन परिवार उरदा, तिली और अरहर की खेती करके अपना परिवार पालने लगे। सरकार द्वारा ये पट्टे नियमानुसार 10 वर्ष के लिए दिए थे। 10 वर्ष बाद इन पट्टों का नवीनीकरण किया जाना था। लेकिन 10 वर्ष होने के पहले ही नेशनल हाइवे की इन कीमती जमीनों पर पैसों वालों की नजर पड़ी। पैसों वाले, राजस्व और रजिस्ट्री कार्यालय के सरकारी कर्मचारी और दलालों का गठबंधन बना और हरिजनों को सरकारी जमीन वापस होने का भय दिखाकर उन्हें जमीन बेचने के लिए मजबूर किया गया। इसके बाद इन गठबंधन ने राजस्व अधिनियम को ताक पर रखते हुए कलेक्टर से अनुमति लिए बगैर ही हरिजनों के पट्टे की जमीन धीरे-धीरे खरीदना शुरु कर दिया। कुछ वर्षो में हरिजनों के पट्टे की सारी जमीन की बिक्री हो गई और हरिजन परिवार एक बार फिर किसान से भूमिहीन मजदूर बनकर रह गए। हरिजनों की इन जमीनों पर आज बड़े-बड़े फॉर्म हाउस और अन्य तरह के निर्माण कर लिए गए हैं।
इन जमीनों का हुआ घालमेल
छतरपुर तहसील के पटवारी हल्का खौंप में 38 खसरा नंबरों पर दर्ज 45 एकड़ जमीन के पट्टे शासन ने वर्ष 1984-85 में हरिजनों को दिए थे। खसरा नंबर 89/१ से लेकर 89/10 तक, खसरा नंबर 90/1 से लेकर 90/९ तक, खसरा नबंर 91/2, 91/३, खसरा नबंर 92/१, 92/2, 92/3, खसरा नबंर 93/१, ९३/२, ९३/३, खसरा नबंर ९४/१, ९४/२, ९४/३, खसरा नबंर 95/१, ९५/२, ९५/३, खसरा नबंर 96/१, ९६/२, ९६/ ३ और खसरा नंबर 97/१, ९७/२ में हरिजनों को खेती के लिए जमीन के पट्टे दिए गए थे। किसी भी हरिजन को 5 एकड़ का पट्टा नहीं मिला था। ज्यादातर हरिजनों को एक एकड़ से लेकर तीन एकड़ तक जमीन के पट्टे मिले। ऐसे में 5 एकड़ से कम जमीन के पट्टे होने के कारण इन जमीनों को बचने से ये हरिजन भूमिहीन बन रहे थे, जबकि नियम के अनुसार भूमिहीन होने की स्थिति में न तो अनुमति मिलेगी और न ही बिक्री होगी। इसके वाबजूद सरकारी तंत्र ने पट्टे की इन जमीनों को नियम कानून ताक पर रखकर बिकने दिया।
नियम को ताक पर रखकर हुई खरीद-फरोख्त
रिटायर्ड एसडीएम ने बताया कि, राजस्व अधिनियम के अनुसार हरिजनों और आदिवासियों को दी गई पट्टे की जमीन की बिक्री केवल कलेक्टर से अनुमति लेकर ही की जा सकती है। ये अनुमति कलेक्टर द्वारा विशेष परिस्थितियों में तब ही दी जा सकती है, जब पट्टेधारी हरिजन किसान जमीन के बेचने के बाद भूमिहीन न हो जाए, हरिजन के पास कम से कम 5 एकड़ जमीन जीवनयापन के लिए बचती हो, तभी कलेक्टर पट्टे की जमीन को बेचने की अनुमति दे सकते हैं। लेकिन खोंप गांव में नेशनल हाइवे के किनारे की इन जमीनों की बिक्री कलेक्टर की अनुमति के बिना ही कर दी गई। केवल दो मामले में कलेक्टर की अनुमति ली गई। लेकिन इसमें भी तहसीलदार और एसडीएम के प्रतिवेदन में हरिजन को पट्टे की जमीन बेचने पर भूमिहीन होने की बात छिपा ली गई।
रजिस्ट्रार ने भी नहीं कराया नियम का पालन
पट्टे की जमीन की खरीद फरोख्त करके इस तरह से 21 हरिजन परिवारों को मिली पट्टे की जमीन नियम कायदों को ताक पर रखकर खरीद ली गई। ये परिवार भूमिहीन हो गए। इसकी खबर न तो पटवारी, तहसीलदार और एसडीएम ने ली और न ही रजिस्ट्री करते समय रजिस्ट्रार और रजिस्ट्री ऑफिस के कर्मचारियों ने कलेक्टर की अनुमति की जरु री शर्त का पालन कराया। खरीददार, सरकारी तंत्र और दलालों के गुट ने राजस्व विभाग से लेकर रजिस्ट्री ऑफिस तक ऐसा जाल बुना कि, सरकारी जमीन की खरीदी सरकारी नियमों को ताक पर रखकर कर ली गई।
Published on:
04 Feb 2019 07:00 am

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