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छतरपुर

खत्म हो गए शहर के चार तालाब, अब चार बड़े तालाबों पर खतरा

कचरा, नाली का पानी और जलकुंभी से दम तोड़ रहे तालाब

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छतरपुर। शहर के अधिकांश तालाब अतिक्रमण का शिकार हैं। उनको मिट्टी कूड़ा-कचरा आदि डालकर भरा जा रहा है। कई तालाब जलकुंभी का शिकार बन गए हैं। तालाबों में पानी आने के प्राकृतिक रास्ते अवरुद्ध कर दिए गए हैं, जिससे उनमें बारिश का पानी संग्रहित नहीं हो पा रहा है। कुछ तालाबों का वर्ष 2008-09 में गहरीकरण कराया गया था लेकिन उसका कोई खास फायदा नहीं मिला है। तालाबों में प्राकृतिक तरीके से पानी के आने के रास्ते बंद होने व उसमें कचरा डाले जाने और नियमित सफाई व्यवस्था नहीं होने से तालाब अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे हैं। ऊपर से अतिक्रमण के कारण तालाबों का रकबा भी सिमटता जा रहा है।

चार तालाब पूरी तरह हो गए खत्म
रियासत काल से लेकर दो दशक पहले तक कभी छतरपुर को तालाबों का शहर कहा जाता था, लेकिन शहर के 11 में से 4 तालाब तो पूरी तरह खत्म हो गए हैं। बचे 7 तालाब भी भू-माफियाओं के निशाने पर है। अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहे शहर के तालाबों की दयनीय स्थिति और रसूखदार भू-माफियाओं की पहुंच का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी पुराने राजस्व रिकॉर्ड में 11 तालाब दर्ज हैं लेकिन 11 में से 4 तालाब न केवल पूरी तरह खत्म हो चुके हैं बल्कि उन पर बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी कर दी गईं हैं। खसरा नंबर 779 आज भी शासकीय रिकॉर्ड में बंधान दर्ज है जिसका रकवा 0.162 बन्दोबस्त के रिकार्ड में दर्ज है। खसरा नंबर 1285 भी बंदोबस्त के रिकॉर्ड में बंधिया के नाम से दर्ज है जिसका रकवा 0.141 पूराने राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है। खसरा नंबर 1413 एवं 1625 पुराने राजस्व रिकॉर्ड में बांध के नाम से दर्ज है जिसका रकवा क्रमश: 0.417 एवं 0.320 बंदोबस्त के रिकार्ड में दर्ज है। इसी तरह खसरा नंबर 2815 बंधान के नाम से आज भी पुराने राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज है जिसका रकवा 0.522 बंदोबस्त के रिकॉर्ड में दर्ज है। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि शहर के यह चारों तालाब सिर्फ रिकॉर्ड में दर्ज रह गए हैं, आज हकीकत यह है कि इन चारों तालाबों की जमीन पर बड़ी बड़ी इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। यह तालाब आज पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं।

ग्वालमंगरा तालाब की हालत खराब
ग्वालमंगरा तालाब के मूल रकवे पर अतिक्रमण कर लगातार कब्जा हो रहा है। हर वर्ष तालाब न सिर्फ सिकुड़ रहा है बल्कि तालाब में गंदे पानी के नए स्त्रोत भी छोड़े जा रहे हैं। ग्वाल मंगरा तालाब में प्लास्टिक, पॉलीथिन एवं अन्य कचरा इतनी मात्रा में फेंका जा रहा है कि घाटों के समीप पानी ही नजर नहीं आता। पूरे तालाब में जलकुंभी के कारण हरी चादर दिखाई देती है। यही हालात संकट मोचन तालाब के हैं जहां गंदी नालियां तालाब में छोड़ी गई हैं।

विंध्यवासिनी तालाब में टौरिया मोहल्ला की सीवर लाइन
महोबा रोड स्थित विध्यवासिनी तलैया में जानराय पहाड़ी सहित टौरिया मोहल्ले का गंदा पानी नालियों से पहुंचता है। इस कारण यहां का पानी हमेशा गंदा बना रहने के साथ ही दुर्गंध देता रहता है। इस पानी की दुर्गंध के कारण माता के मंदिर पहुंचने वाले लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसी प्रकार महलों के पास स्थित रानी तलैया और सटई रोड स्थित छुई खदान तलैया की कई सालों से सफाई न होने से आसपास के घरों से निकलने वाला गंदा पानी सालों से भरा हुआ है। महोबा रोड स्थित विध्यवासिनी तलैया में गंदी बस्ती क्षेत्र का पानी और लोगों के द्वारा पूजन सामग्री डालने के कारण गंदा हो रहा पानी। जिम्मेदारों द्वारा भी तलैया की साफ-सफाई के लिए कोई अभियान नहीं चलाया जा रहा है, बदबू आ रही है।

गायत्री तलैया में बस स्टैंड का गंदा पानी
जवाहर रोड स्थित गायत्री मंदिर तलैया में दोनों बस स्टैंड सहित नौगांव रोड, फव्वारा चौक और दूध नाथ कॉलोनी के घरों का गंदा पानी आता है। पूरी तलैया का पानी गंध मारता है। इस तलैया में जल कुंभी का घेरा होने से घांस का मैदान जैसा लगने लगा है। लोगों ने नगर पालिका प्रशासन को इसकी कई बार शिकायत की है, पर कार्रवाई नहीं हुई।

तीन तालाबों की हो चुकी है सफाई
संकट मोचन, गायत्री तालाब और ग्वाल मंगरा तालाब की सफाई पूर्व में समाजसेवियों ने श्रमदान के जरिए की। श्रमजीवियों की मेहनत रंग लाई और जलकुंभी से पट चुके तालाब जलकुंभी मुक्त हो गए। लेकिन तालाब में गंदा पानी, कचरा और अतिक्रमण से जलभराव रुकने पर कोई ठोस प्लानिंग नहीं होने से फिर से तालाब जलकुंभी की चपेट में हैं। जिसमें गायत्री तालाब वर्तमान में पूरी तरह से जलकुंभी से पटा हुआ है। तालाब घास का मैदान नजर आने लगा है।

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