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मौन रहकर 12 साल तक दीपावली के अवसर पर मौनिया नृत्य के जरिए होती की अराधना

बरेदी (दिवारी) नृत्य में बुंदेली लोक संस्कृति की झलक मिलती है। दीपावली के बाद परेवा और भैया दूज को इस नृत्य की अनोखी छटा पूरे अंचल में बिखरती है। आकर्षक परिधान में कलाकारों की टोलियां गांव-गांव में नृत्य की कला का प्रदर्शन करते हैं।

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मौनिया नृत्य

छतरपुर. बरेदी (दिवारी) नृत्य में बुंदेली लोक संस्कृति की झलक मिलती है। दीपावली के बाद परेवा और भैया दूज को इस नृत्य की अनोखी छटा पूरे अंचल में बिखरती है। आकर्षक परिधान में कलाकारों की टोलियां गांव-गांव में नृत्य की कला का प्रदर्शन करते हैं। नृत्य की ये कला मार्शल आर्ट के जैसी है, जिसमें नृत्य में लाठी का इस्तेमाल भी मार्शल आर्ट से कम नहीं है। बरेदी दिवारी नृत्य अहीर ग्वाले करते हैं। ढोल-नगाड़े बजते ही पैरों में घुंघरू, कमर में पट्टा व हाथों में लाठियां संग इनका जोशीला अंदाज देखते बनता है। एक-दूसरे पर लाठी के तड़ातड़ वार से दिल दहल जाते हैं। हालांकि, लाठियों से किसी को तनिक भी चोट नहीं आती है।

चंदेलकाल में शुरु हआ नृत्य


बुन्देलखंड का दिवारी नृत्य बुन्देलों के शौर्य एवं वीरता का प्रतीक है। इतिहासकारों का मानना है कि चंदेल शासन काल में शुरू हुई इस अनूठी लोक विधा का मकसद था कि घर-घर में वीर सपूत तैयार किए जा सकें और वह बुराई व दुश्मनों के ख़िलाफ़ लड़ सकें। आयोजन का समय प्रकाश के पर्व दीपावली के कुछ दिन पहले से ही गांव-गांव में लोग टोलियां बना दीवारी खेलने का अभ्यास करने लगते हैं। जो भाई बहन के प्यार के पर्व भैया दूज के दिन खत्म होता है। इसके बाद दोहों व लोक गीतों के साथ दिवारी नृत्य की शुरूआत होती है। कार्तिक के पवित्र माह में हर तरफ इस लोक विधा की धूम मची रहती है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इसका ख़ासा प्रचलन है।

मोर पंख पहनकर होता है मौनिया नृत्य


बुंदेलखण्ड अपने आप में बहुत से लोक नृत्य और लोक संगीतों को सजोय हुए है, जिनका अपना-अपना महत्व है। इन्हीं लोक नृत्यों में से एक है मौनिया नृत्य। मौनिया नृत्य बुंदेलखण्ड में अहीर जाति द्वारा किया जाता है। विशेष रूप से यह नृत्य दीपावली के दूसरे दिन किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष अपनी पारंपरिक लिवास पहनकर मोर के पंखों को लेकर एक घेरा बनाकर करते हैं। बुंदेलखंड का सबसे प्राचीन नृत्य मौनिया, जिसे सेहरा और दीपावली नृत्य भी कहते हैं। बुंदेलखंड के गांव-गांव में किशोरों द्वारा घेरा बनाकर, मोर के पंखों को लेकर, बड़े ही मोहक अंदाज़ में किया जाता है।

मौन रहकर होती है अराधना


बुंदेलखण्ड के ग्रामीण अंचलों के लोगों के मौन होकर इस नृत्य को करने से इस नृत्य का नाम मौनिया नृत्य रखा गया। साथ ही मौन रखकर व्रत करने वालों को मौनी बाबा भी कहा जाता है। मौन परमा के दिन के साथ-साथ इस नृत्य को बुंदेलखण्ड में दीपावली के समय करने की परंपरा है। प्राचीन मान्यता के अनुसार जब श्रीकृष्ण यमुना नदी के किनारे बैठे हुए थे, तब उनकी सारी गायें कहीं चली गयीं। प्राणों से भी अधिक प्रिय अपनी गायों को प्यार करने वाले भगवान श्रीकृष्ण दु:खी होकर मौन हो गए, जिसके बाद भगवान कृष्ण के सभी ग्वाल दोस्त परेशान होने लगे। जब ग्वालों ने सभी गायों को तलाश लिया और उन्हें लेकर लाये, तब कहीं जाकर कृष्ण ने अपना मौन तोड़ा। तभी से परम्परा के अनुसार श्रीकृष्ण के भक्त गांव-गांव से मौन व्रत रख कर दीपावली के एक दिन बाद मौन परमा के दिन इस नृत्य को करते हुए 12 गांवों की परिक्रमा लगाते हैं और मंदिर-मंदिर जाकर भगवान श्रीकृष्णा के दर्शन करते है।