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विकास के लिए सत्यता और सात्विकता आवश्यक

 नेता देश को अपना घर समझे तो आज से ही देश बदलाव और प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है।

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Prashant Sahare

Feb 18, 2016

छिंदवाड़ा.
सत्ता का लोभ और सत्यता का विलोप होना देश में अस्थिरता, अराजकता का कारण बन रहा है। आज के नेता स्वार्थं की राजनीति कर रहे हैं। सत्ता में सत्य का अंश नहीं रह गया है। समस्याएं और मुश्किलें इसी से बढ़ रही है। ये जब तक है तब तक स्थिरता नहीं आ सकती। नेता देश को अपना घर समझे तो आज से ही देश बदलाव और प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है।


यह बात जैन आचार्यं विशुद्ध सागरजी ने कही। गुरुवार को गोलगंज स्थित कांच मंदिर में दोपहर को पत्रकारों से एक अनौपचारिक चर्चां में उन्होंने कहा कि हमें समाज और देश का विकास करना है तो सत्यता और सात्विकता लानी पड़ेगी। हमारे वेद, ग्रंथों में तो तामसी भोजन को भी निषेध माना है इसी लिए कि वह हमारी प्रकृति हमारे व्यवहार को भी वैसा बनाता है। भोजन भाषा को बदलने की शक्ति रखता है। संतों के प्रति समाज के बदलते व्यवहार पर आचार्यं ने कहा कि संत को स्वाध्यायी होना चाहिए।


वह अपने निज से जुड़े। आजकल संत भक्तों को जोड़कर अपने आपको बड़ा होने का तर्कं देते हैं। पहले राजनेता धर्मं से जुड़ते थे आज धमाज़्त्मा नेताओं से जुड़े हैं। गंथ की जगह यदि संत के हाथ में समाज की फ ाइलें आ गईं हैं। उन्होंने कहा कि जो साधना में लीन हो वह संत है। जिसमें साधुत्व का भाव हो वह साधू है।


केवल्य ज्ञान सर्वंज्ञ ज्ञान है। इंद्रिय ज्ञान सबकुछ नहीं है। समाज को संदेश देते हुए आचार्यंश्री ने कहा कि हम अपना अधिकार मांगते हैं लेकिन हमारा कर्तंव्य क्या है हमें ये भी सोचना होगा। सड़क पर चलना हमारा अधिकार है लेकिन दूसरों को भी चलने देना हमारा कर्तंव्य है।


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