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ज्ञान से आती है नम्रता : आचार्य वर्धमानसागर

ज्ञान अनुभूति का आकाश है और ज्ञान की प्राप्ति विनय से होती है। बिना नम्रता के इनसान को ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। यदि नम्र नहीं बने तो पाया हुआ ज्ञान अहिंकार का रूप धारण कर लेता है। साधना की सफलता का धोतक ज्ञान है। पापों को बचाने का इलाज ज्ञान है।

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ज्ञान से आती है नम्रता : आचार्य वर्धमानसागर

संघ के पदाधिकारियों और लाभार्थियों द्वारा गणिवर्य द्वारा संकलित पुस्तक नमुं नवपद जग जयकारी का संघार्पण किया गया।

कोयम्बत्तूर. श्री राजस्थान जैन मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में आचार्य श्री वर्धमानसागर सूरीश्वर महाराज और गणाचार्य श्री कल्याण पद्मसागर महाराज आदि साधु-साधवी के सानिध्य में शाश्वती नवपद ओली की आराधना के सातवे दिन ज्ञान पद की महत्तवा बताई गई। आचार्यश्री ने बताया कि ज्ञान अनुभूति का आकाश है और ज्ञान की प्राप्ति विनय से होती है। बिना नम्रता के इनसान को ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता है। यदि नम्र नहीं बने तो पाया हुआ ज्ञान अहिंकार का रूप धारण कर लेता है। साधना की सफलता का धोतक ज्ञान है। पापों को बचाने का इलाज ज्ञान है। अंधकार से उजाले की यात्रा का पथेय ज्ञान है। अज्ञानता से अंधकार से युक्त मन को ज्ञान मुक्ति के मंगल स्थान पर प्रतिष्ठित करता है। सिर्फ अक्षरों का बोध ही ज्ञान नहीं होता है, परंतु ज्ञान के साथ परिणति में भी परिवर्तन होना चाहिए। जैसे गरीब इनसान के धनवान बनने पर उसके तेवर बदल जाते हैं। ठीक बैसे ही इनसान को ज्ञानवान बनने में परिणति में परिवर्तन आना चाहिए। संघ के सचिव राकेश बाफना ने बताया कि इस पावन अवसर पर संघ के पदाधिकारियों और लाभार्थियों द्वारा गणिवर्य द्वारा संकलित पुस्तक नमुं नवपद जग जयकारी का संघार्पण किया गया। उनके लेखों के द्वारा यह पुस्तक अपने आप में एक गरिमा पूर्ण ग्रंथ है। जिसमें जीवन जीने की कला है तो संसार रूपी बला से पीछा छोड़ाने का मार्ग है। जो संसार की तृणा को समाप्त कर संतोष धन को अपर्ण करती है। जिसका परिणाम संख्या के सम्बंध से मूल को जोडऩे का काम करती है। बाद में इस पुस्ताक का लोकापर्ण संघ के पदाधिकारियों और लाभार्थियों द्वारा किया गया।