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संतों की संगत से जीवन पवित्र

जैन आचार्य रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि जीवन में पवित्रता के लिए आंखों की पवित्रता जरुरी है। जैसे दृश्य देखते हैं हमारा मन भी उससे प्रभावित होता है।

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pravachan

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ईरोड. जैन आचार्य रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि जीवन में पवित्रता के लिए आंखों की पवित्रता जरुरी है। जैसे दृश्य देखते हैं हमारा मन भी उससे प्रभावित होता है। टीवी व मोबाइल पर वीभत्स दृश्य देख युवा पीढ़ी भ्रमित हो रही है। महिलाएं असुरक्षित हो गई हैं।
आचार्य मंगलवार को यहां जैन भवन में धर्मसभा में प्रवचन कतर रहे थे। उन्होंने कहा कि कीमती वस्तुओं की रक्षा के लिए अधिक जतन करनेे पड़ते हैं उसी प्रकार व्रत-नियमों में ब्रह्मचर्य महाव्रत की अधिक कीमत है। उसकी सुरक्षा के लिए ब्रह्मचारी को नौ बंधनों का पालन करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि जैसी वस्तुओं की कीमत होती है उनकी सुरक्षा उपाय भी वैसे ही करने पड़ते हैं। जैसे किसान या फल के पेड़ का मालिक पशु पक्षियों से फसल को बचाने के लिए बाड़ या चौकीदार नियुक्त करता है। इसी प्रकार सुनार भी अपनी दुकान के बाहर बंदूकधारी चौकीदार रखता है।
आचार्य ने कहा कि वेशभूषा भी हमारे मन को प्रभावित करती है। भड़कीले वस्त्रों का विपरीत प्रभाव पड़ता है। मन में काम वासना पैदा होती है। युवाओं ने फिल्मों को देख तंग कपड़ों का अनुसरण किया जिससे पवित्रता घटी है। उन्होंने कहा कि तामसिक भोजन, मांसाहार मन में क्रोध पैदा करता है। क्रोध के आवेश में हुई भूलों से जीवन भर पछताना पड़ता है। मिठाई, फल, मेवे अधिक मात्रा में खाना भी काम वासना को बढ़ाता है। जीवन में पवित्रता लाने के लिए हमें आहार सात्विक व सादा रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि साधु संतों के जीवन में टीवी, मोबाइल नहीं होता, आहार नियंत्रित व सादा होता है। इससे जीवन में पवित्रता बनी रहती है। साधु संतों की संगत भी जीवन को पवित्र बनाती है। जिस प्रकार इत्र की दुकान पर कोई खरीदे या न खरीदे उसकी सुगंध सर्वत्र रहती है उसी प्रकार साधु की संगत से ही जीवन में पवित्रता की सुगंध आ ही जाती है।
गुरूवार सुबह नौ बजे समाधि-मृत्यु की भाव यात्रा का संगीतमय कार्यक्रम होगा।