
धर्म आराधना से जीवन सफल
कोयम्बत्तूर. जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि मनुष्य का जीवन धर्म की आराधना करने से ही सफल होता है। संसार में जन्मों का भ्रमण दुखदायी है। जब तक आत्मा का मोक्ष नहीं होता तब तक आत्मा जीव में किसी न किसी रूप मेें जन्म लेती रहती है। धर्म की आराधना करना जरुरी है,अन्यथा मनुष्य जन्म सार्थक नहीं है।
वे गुरुवार को Coimbatore यहां बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन ट्रस्ट की ओर से राजस्थानी संघ भवन में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम में धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि मनुष्य का जन्म, मरण दुखदायी होने पर भी दर्शन, ज्ञान चरित्र स्वरूप रत्नत्रयी की आराधना से दुखों का क्षय करके आत्मा मुक्तिपद को प्राप्त कर सकती है। जिनके जीवन में आराधना नहीं है वह मनुष्य जीवन के बावजूद अधोगति के गर्त में चले जाते हैं। धर्म रहित मनुष्य का पतन अधिक होता है।
आचार्य ने कहा कि जैसे जीवन में युवा अवस्था महत्वपूर्ण है वैसे ही वर्ष भर में चातुर्मास महत्वपूर्ण है। बालक को ईनाम की, बड़ों को नाम की इच्छा होती है लेकिन धर्मी को केवल अनाम सिद्धि की आवश्यकता होती है। तप करने वाले व उन्हें सहयोग देने वाले धन्य हैं। तप धर्म के अंतरायों का क्षय करता है। इससे पूर्व पर्युषण पर्व के निमित्त ४ मास क्षमण, २६ सिद्धितप, १०० से अधिक अटठाई, आदि तत्पश्चर्याओं की अनुमोदना की गई। कार्यक्रम का संचालन सुरेश गुलेच्छा ने किया। छह सितम्बर से प्रवचन जैन मेनोत अपार्टमेंट बहुफणा मंदिर में होंगे।
जैन एनसायक्लोपिडिया अराउंड दी वल्र्ड के लेखक डॉ. पद्मनाभन गुरुवार को राजस्थानी संघ भवन में आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर को पुस्तक की प्रति भेंट करते हुए। इस मौके पर रमेश बाफना व एम. एम. भराडिय़ा भी मौजूद रहे।
Published on:
06 Sept 2019 11:31 am
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