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आत्मा को भ्रमित करता है मोह

जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि मोह आत्मा का शत्रु है। आत्मा को संसार में भटकाने वाला मोह ही है। राग व द्वेष मोह की संतानें हैं। मोह आत्मा को भ्रमित करता है। मोह के कारण सुख के साधन दुख के साधन लगते हैं।

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आत्मा को भ्रमित करता है मोह

आत्मा को भ्रमित करता है मोह

कोयम्बत्तूर. जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि मोह आत्मा का शत्रु है। आत्मा को संसार में भटकाने वाला मोह ही है। राग व द्वेष मोह की संतानें हैं। मोह आत्मा को भ्रमित करता है। मोह के कारण सुख के साधन दुख के साधन लगते हैं। जो दुख के साधन हैं वह सुखके साधन लगते हैं। आचार्य शनिवार को बहुफणा पाश्र्वनाथ जैन उपाश्रय में धर्म सभा में प्रवचन कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि संसार के भौतिक सुख क्षणिक हैं। इसीलिए जैन संत यशोविजय ने कहा कि अहंकार व ममकार के कारण जगत के सभी जीव मोहांध में हैं। अहंकार अर्थात अभिमान ममकार अर्थात ममत्व भाव।
जगत के बाह्य जड़ पदार्थ कभी अपने हुए ही नहीं फिर भी उन्हेंं अपना मानना ही झूठा ममत्व का भाव है। इन पदार्थों को पाने के लिए जीवात्मा दिन रात एक कर देती है। इन पदार्थों को एकत्र कर उनकी वृद्धि कर वह खुश होती है। एक सेचनक हाथी व मूल्यवान हार को पाने के लिए कोणिक ने अपने सगे भाई हल्ल - विह्ल और मामा चेटक के साथ युद्ध किया था।
उन्होंने कहा कि जमीन राज्य, धन कभी आत्मा का हुआ ही नहीं फिर भी उनके प्रति मोह के कारण आत्मा युद्ध के लिए भी तैयार हो जाती है।
आचार्य ने कहा कि ज्ञान, दर्शन आत्मा के गुण है आत्मा की संपत्ति है। किंतु मोह की अधीनता के कारण आत्मा संपत्ति की उपेक्षा करती है और धन, सत्ता व स्त्री को पाने के लिए रात दिन प्रयत्न करती है। जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को कुछ दिखाई नहीं देता उसी प्रकार मोह के कारण अंधी बनी आत्मा को भी वास्तविकता का भान नहीं होता।
मैं शुद्ध आत्म द्रव्य हूं और निर्मल ज्ञान मेरा गुण है मैं, ज्ञानादि गुणों से भिन्न नहीं हूं, ज्ञान आदि से भिन्न पदार्थ मेरे नहीं है । सचमुच यह मोह को नष्ट करने का प्रबल शस्त्र है। मोह के उदय के कारण ही जीवात्मा को जड़ पदार्थों में ममत्व बुद्धि पैदा होती है। मोह का जोड़ उतर जाए तो आत्मा के मूलभूत ज्ञान आदि गुणों में प्रीति पैदा होती है। मोह जिनवाणी के श्रवण में बाधक बनता है कई बार उपदेश के दौरान आत्मा व्यापार के बारे में विचार करने लगती है । सोचती है व्याख्यान से व्यापार नहीं चलेगा। मोह का उदय जीवात्मा को जिनवाणी से वंचित रखता है। मोह के उदय वाली आत्मा जिनेश्वर भगवंत के बताए मार्ग पर चलने को तैयार नहीं होती। मोहाधीन आत्मा धर्म व धर्म के साधनों से दूर भागती है। रविवार को जैन मैन्योर में मन के जीते जीत विषय पर प्रवचन होंगे।