
भव भ्रमण का अंत करने वाली ही सच्ची तीर्थ यात्रा
कोयम्बत्तूर. जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि सच्ची यात्रा वही है जो व्यक्ति के भव भ्रमण का अंत करती है। इसे बढ़ाने वाली यात्रा भव भ्रमण नहीं है। उन्होंने कहा कि यात्राएं कई प्रकार की होती हैं जीवन यात्रा करते समय मनुष्य कई सुख दुख का अनुभव करता है। कहीं जाने के लिए रेल बस या अन्य साधनों का प्रयोग करते हैं। जीवन यात्रा पूर्ण होने पर मनुष्य अंतिम यात्रा स्वरूप श्मशान यात्रा करता है। उन्होंने कहा कि जिनेश्वर भगवान के पांच कल्याणकों स्थान अथवा सौ वर्ष पूर्ण स्थापित मंदिर या प्रतिमाएं आदि स्थावर तीर्थ हैं।
परमात्मा की ओर से निर्देशित आत्म कल्याण के मार्ग पर संयम यात्रा करते साधु साध्वी जंगम तीर्थ है। तीर्थ की भक्ति करने से आत्मा स्वयं तीर्थंकर पद प्राप्त करती है।
तीर्थ यात्रा में हमें नियमों का पालन करना पड़ता है। तीर्थ यात्रा में जितना कष्ट होगा उतनी ही कर्मों की निर्जरा का क्षय होगा। शरीर व आत्मा में से हमें किसी एक को छोडऩा होगा। तीर्थ यात्रा करते हुए शरीर की अनुकूलता का आनंद उठाना चाहे तो वह यात्रा आत्मा को नुकसान पहुंचाने वाली है। तीर्थ यात्रा में समर्थ आत्मा को ही प्रधानता दी जानी चाहिए। सात्विक आहार आदि का भी सयंम रखना होगा।
उन्होंने कहा कि तीर्थ यात्रा में जूते चप्पल आदि का त्याग करना होता है। चलते हुए स्व-पर व जीव जंतुओं की रक्षा करनी होती है। तीर्थ यात्रा पर्वतों व जंगलों में होती है जहां प्रभु के स्वरूप से जुडऩे के लिए एकांत की प्रवृत्ति होती है। तीर्थ यात्रा करने वाले यात्रियों की धूल भी पूजनीय होती है। इनमें से ही कोई आचार्य, साधु, गणधर या तीर्थंकर बन सकता है। इनकी भक्ति से हीभव भ्रमण का अंत आ जाता है।
राजस्थानी संघ भवन में बुधवार को सुबह १० बजे से उवसग्गहर का महापूजन होगा। इसमें बंगलुरू के सुरेन्द्र गुरु विधि विधान से पूजन करेंगे। ५ दिसम्बर से सर्वसिद्धि पाश्र्वनाथ जिनालय अव्वलपुंदराई के लिए १० दिवसीय छड़ी पालक संघ यात्रा प्रारंभ होगा।
Published on:
04 Dec 2019 01:04 pm
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