
पाश्र्वनाथ प्रभु की आराधना से जीवन में शांति
कोयम्बत्तूर.जैन आचार्य विजय रत्नसेन सूरीश्वर ने कहा कि जैन धर्म में सभी प्रकार की आराधना का उद्देश्य आत्म कल्याण व आत्म शुद्धि है। दुनिया में अनेक पर्व हैं लेकिन वह आनंद व प्रमोद के लिए हैं जबकि जैन धर्म के पर्व आत्मा की आराधना के लिए होते हैं। वह सेलम के ट्रस्ट मंडल में पोष-दशम आराधना के संबंध में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। कमठ व धरणेन्द्र ने अपने उचित उपसर्ग और भक्ति करते हैं लेकिन पाश्र्वनाथ प्रभु उन दोनों पर समान वृत्ति वाले हैं।
20 दिसम्बर से पोष दशमी की आराधना शुरू होगी। पोष दशमी की आराधना का मुख्य उद्देश्य जीवन व म़ृत्यु के पलों में समाधि प्राप्त करना है। जिसके जीवन में समाधि होगी उसे मृत्यु समाधि प्राप्त होगी। जिस आत्मा को मृत्यु समय समाधि प्राप्त होगी उसे परलोक में सद्गति व परंपरा से मुक्ति की प्राप्ति होगी।
उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में सबसे बड़ी समस्या समाधि भाव की है। आराधनाएं बढ़ रहीं है लेकिन समाधि भाव घट रहा है। काया से धर्म आराधनाएं हो रही हैं लेकिन चित्त संकलेशग्रस्त हैं। व्यक्ति असमाधि भाव में डूबा रहता है। काया से अठ्ठम अठई व मासक्षमण जैसी तत्पश्चर्याएं हो जाती हैं परंतु चित्त आकुल व्याकुल रहता है। २० दिसम्बर को आचार्य संघ का सेलम में प्रवेश होगा।
Published on:
18 Dec 2019 11:55 am
बड़ी खबरें
View Allकोयंबटूर
तमिलनाडु
ट्रेंडिंग
