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सुख-दुख सिर्फ कल्पना

जाग्रत रहने वाला व्यक्ति अनुभव करता है कि सुख व दुख का कारण नहीं है सिर्फ कल्पना का जाल है। यह समझ में आते ही स्वयं के भीतर एक नया आकाश खुल जाता है। तब यह पता चलता है कि मैं ही हूं। न सुख है न दुख है। स्वयं के बोध में ही आनंद है।

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सुख-दुख सिर्फ कल्पना

सुख-दुख सिर्फ कल्पना

कोयम्बत्तूऱ.जाग्रत रहने वाला व्यक्ति अनुभव करता है कि सुख व दुख का कारण नहीं है सिर्फ कल्पना का जाल है। यह समझ में आते ही स्वयं के भीतर एक नया आकाश खुल जाता है। तब यह पता चलता है कि मैं ही हूं। न सुख है न दुख है। स्वयं के बोध में ही आनंद है।
यह बात जैन मनि हितेशचंद्र विजय ने सुपाश्र्वनाथ जैन आराधना भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही।
उन्होंने कहा कि संस्कार जीवन व्यवहार का महत्वपूर्ण पहलू है। व्यवहार में सदाचार जीवन का आधार है और मानव की पहचान है। यही कार्य व्यक्ति के भावी कर्म की पहचान कराता है। कुछ संस्कार व्यक्ति के जन्म के साथ आते हैं वह उसके पूर्व कर्मों की पहचान कराते हैं। अपने जीवन को समझना अपनी जीवन शैली का अंग है। स्वाध्याय काल में चिंतन करते रहना स्वयं के बारे में एक नियमित आवश्यकता है। इसी से व्यक्ति अपने मूल स्वरूप तक पहुंच पाता है। माता-पिता की ओर से दिए संस्कारों को जीवन में उतार सकता है।
उन्होंने कहा कि सामान्य जीवन में होने वाली प्रक्रियाएं और नासमझ लोगों की ओर से हमारे लिए की गईं प्रतिक्रियाएं मन में द्वंद्व पैदा करती है। मनुष्य को इन परिस्थितियों में समभाव के साथ प्रतिक्रियाओं का सामना करना होता है। इस युग में प्रशंसक व निदंक है। प्रशंसा से अभिमान नहीं करना चाहिए व निंदा से दुखी नहीं होना। समभाव रखते हुए आगे बढऩा है। इससे पूर्व राजस्थान मूर्ति पूजक संघ की ओर से अतिथियों का बहुमान किया गया।