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जीवन को क्रोध और बोझ नहीं समझें

जीवन को क्रोध व बोझ समझ कर नहीं जीना चाहिए। वरन जीवन अहो भाव से जीना चाहिए। यह बात पंकज मुनि ने कही। वह हाल ही में कोयम्बत्तूर में चातुर्मास पूर्ण कर मेट्टूपालयम कन्नूर होते हुए ऊटी में पहुंचे हैं।

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जीवन को क्रोध और बोझ नहीं समझें

जीवन को क्रोध और बोझ नहीं समझें

ऊटी.जीवन को क्रोध व बोझ समझ कर नहीं जीना चाहिए। वरन जीवन अहो भाव से जीना चाहिए। यह बात पंकज मुनि ने कही। वह हाल ही में कोयम्बत्तूर में चातुर्मास पूर्ण कर मेट्टूपालयम कन्नूर होते हुए ऊटी में पहुंचे हैं।
जैन स्थानक ऊटी में आयोजित धर्मसभा में उन्होंने कहा कि संसार में प्रत्येक मनुष्य जीवन जी रहा है महत्व इस बात का नहीं कि हम कितना जीए महत्व इस बात का है कि जीवन कैसे जीएं। जीवन राम ने भी जीया, रावण ने भी, कृ ष्ण ने व कंस ने भी जीया। जीवन गौतम ने भी जीया और गौशालक ने भी, लेकिन इनमें अंतर जमीन आसमान का है। एक के प्रति श्रद्धा होती है तो दूसरे के प्रति घृणा व नफरत पैदा होती है। कुछ लोग जीवन को इतने शानदार ढंग से जीते हैं कि महापुरुष बन जाते हैं। उनके नाम के स्मरण से लोग दिन की शुरुआत करते हैं। दूसरी ओर कैकयी मंतरा, शूपर्णखा, दूर्योधन, कंस, कीचक, रावण ऐसे नाम हैं जो लोग अपने बच्चों का नाम भी इन पर रखना पसंद नहीं करते। उन्होंने कहा कि कुछ लोग जीवन बिता कर जाते हैं, कुछ गंवा कर, लेकिन महान वह हैं जो जीवन को बना कर जाते हैं। जीवन की तीन शैलियां हैं पहली क्रोध व क्लेश, दूसरी बोझ व मजबूरी व तीसरी शैली उत्तम है जो लोग जीवन को आनंद व अहोभाव से जीते हैं। तीसरी शैली ही सर्वोत्तम होती है।