
गांवों के स्कूलों में तमिल माध्यम से पढ़ी और उनका सपना चिकित्सक बनने का था।
कोयम्बत्तूर. पिछले साल जून में एमबीबीएस व बीडीएस के लिए राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (नीट)का परिणाम घोषित होने के दो दिन के अंतराल में तीन छात्राओं ने आत्महत्या कर ली। तीनों प्रतिभाशाली थी। गांवों के स्कूलों में तमिल माध्यम से पढ़ी और उनका सपना चिकित्सक बनने का था। लेकिन नीट का माध्यम जब हिन्दी व अंग्रेजी किया तो उन लाखों छात्र-छात्राओं का सपना ध्वस्त हो गया जिनका माध्यम प्रांतीय भाषा था।
यह टीस अब फिर से उठी है और द्रविड़ कषगम (डीके) ने आंदोलन के लिए कमर कसी है। तिरुपुर में डीके की बैठक में इस मसले पर चर्चा हुई । कार्यकर्ताओं ने कहा कि एमबीबीएस व बीडीएस में प्रवेश के लिए पहले की तरह हर राज्य में प्री मेडिकल टेस्ट का आयोजन किया जाए। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान से सम्बद्धव केन्द्र के अधीन अन्य चिकित्सा महाविद्यालयों के लिए अलग से प्रवेश परीक्षा होती रही है। उनका कहना था कि प्रदेश स्तर पर आयोजित होने वाली परीक्षाओं से वहां के छात्र-छात्राएं का जुड़ाव रहता है। वे इसके सिलेबस के अनुसार तैयारी करते थे। कार्यकर्ताओं ने कहा कि नीट से केवल अमीरों के अंग्रेजी माध्यम से पढऩे वाले बच्चों को फायदा हो रहा है। या फि र हिन्दी भाषी प्रदेशों के बच्चे प्रवेश ले रहे हैं। यह अन्य भाषा वाले प्रदेशों के साथ भेदभाव है। एक ओर तो मातृभाषा में अध्ययन पर जोर देने को कहा जाता है और कहां देश के छात्र छात्राओं पर हिन्दी व अंग्रेजी थोप दी गई है। उनका कहना था कि यह देश में भाषा को लेकर खाई को चौड़ा करने की कवायद है।
जबकि दक्षिण में हिन्दी को लेकर विरोध कम होता जा रहा है। ऐसी कवायद से फिर माहौल बिगडेगा। केन्द्र सरकार को तत्काल इस पर रोक लगानी चाहिए। उन्होंने अफसोस जताया कि राज्य सरकार भी इस मामले में ढिलाई बरत रही है। तमिलनाडु सरकारी चिकित्सक संघ व इंडियन मेडिकल कौसिंल भी नीट का विरोध कर चुकी है। चिकित्सकों का मानना है कि गांवों के बच्चों की अंग्रेजी पर पकड़ हो नहीं पाती । हिन्दी वे जानते ही नहीं। ऐसे में प्रांतीय भाषा ही सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।नहीं तो ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभावान गरीब बच्चे नई व्यवस्था में डॉक्टर बनने के सपने को पूरा नहीं कर पाएंगे।
Published on:
10 Jan 2020 12:31 pm
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