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MP में 500 साल प्राचीन अष्टभुजा गणेश की प्रतिमा, खुदाई में प्रकट हुए थे अष्टविनायक

गढ़े धन के लालच में खोदा गड्ढा खोदा तो निकले श्री गणेश

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दमोह

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Hitendra Sharma

Aug 31, 2022

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दमोह. गणेश चतुर्थी पर आज भगवान गणेश घर घर विराज रहे हैं। देश प्रदेश में आपने भगवान गणेश के कई मंदिर देखे होंगे, पर क्या आपने भागवान गणेश का अष्टभुजाओं वाली प्रतिमा देखी है। जी हां प्रथमपूज्य विनायक की ऐसी ही 500 से 700 वर्ष प्राचीन प्रतिमा मध्यप्रदेश के दमोह जिले में है जहां गणेश जी स्वयं ही प्रकट हुए थे। आठ भुजाओं वाली विलक्षण प्रतिमा की बनावट भी बेहद खास है। माना जाता है कि यह प्रदेश में इकलौती विरली गणेश प्रतिमा है।

दमोह जिले में श्रीगणेश की मनोहारी मनोकामना पूर्ति वाली प्रतिमाएं 500 से 700 साल पुरानी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापित इन गणेश प्रतिमाओं की अलग ही मान्यता है। विनायक चतुर्थी पर श्री गणेश की प्रतिमाएं स्थापित कर पूजा अर्चना की जाएगी, वहीं श्री गणेश के प्राचीन मंदिरों में भक्तों की आस्था का मेला लगेगा।

तेंदूखेड़ा विकासखंड अंतर्गत आने वाले तेजगढ़ में स्थापित गणेश प्रतिमा अपने आप में दुर्लभ है। यह प्रतिमा अष्टभुजा रूप में विराजमान है। गांव के बुजुर्गों की अपनी अलग-अलग राय है। वृद्ध कहते हैं कि उनके पूर्वजों ने उन्हे बताया कि यहां भगवान गणेश की अष्टभुजा प्रतिमा 500 वर्ष पूर्व जमीन के नीचे से प्रकट हुई थी। जिसे तेजगढ़ के राजा तेजी सिंह ने गणेश घाट के समीप स्थपित कराया था। उसी समय से उस घाट का नाम भी गणेश घाट पड़ गया। इसके साथ तेजगढ़ गांव को भी राजा तेजी सिंह ने ही बसाया था।

वृद्ध दामोदर सोनी, डॉ. अनूप सिंह लोधी व बट्टू यादव ने बताया कि 500 साल पहले ओरछा में हरदोल का जन्म हुआ था और उसी समय राजा तेजी सिंह का भी जन्म हुआ। उन्हीं के राज में यह प्रतिमा स्थापित है। तेजगढ़ में 70 साल से ग्रामीण क्षेत्रों में गणेश प्रतिमाएं स्थपित होने लगी हैं, इसके पहले 50 गांवों में कोई प्रतिमा स्थापित नहीं होती थी। भगवान गणेश के मंदिर के पास ही एक प्रतिमा स्थापित की जाती थी जो रस्म आज भी चली आ रही है।

बाबड़ी में गढ़ा धन खोदा निकली प्रतिमा
रियाना गांव से एक किमी दूर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है। स्थानीय ग्रामीण बताते हैं कि गणेश जी की प्रतिमा हजारों साल पुरानी है, जिसके कारण से ये प्रतिमा श्रद्धा का केंद्र बनी है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यहां के लोगों ने प्राचीन बाबड़ी से गढ़े धन के लालच में खुदई की गई, वहां धन तो नहीं मिला लेकिन हजारों साल पुरानी गणेश प्रतिमा निकली। जिसे पीपल के पेड़ के नीचे रख दिया गया है। ग्रामीणों ने चबूतरा बनाकर प्रतिमा तो रख दी लेकिन खुली में रखी प्रतिमा का धूप व बारिश से क्षरण हो रहा है, पुरातात्विक महत्व की इस प्रतिमा के संबंध में पुरातत्व विभाग ने भी कोई खोजबीन नहीं की।

नोहटा का प्राचीन गणेश मंदिर
नोहटा गांव में गणेश जी की मडिय़ा है, यह मडिय़ा है जिसमें विराजमान प्रतिमा करीब 700 साल पुरानी बताई जा रही है। मंदिर परिसर में गजराज के समान दिव्य स्वरूप में भगवान की पाषाण प्रतिमा विराजमान है। जहां पर गणेशोत्सव पर्व के दौरान दर्शनार्थियों की आवाजाही बनी रहती है। यह भी मनोकामना पूर्ति वाली सिद्ध प्रतिमा है।

झागर में 18 भुजी गणेश प्रतिमा
दमोह से 27 किमी दूरी पर दमोह-सागर रोड पर स्थित झागर गांव में तालाब किनारे स्थित सिद्धि विनायक मंदिर हैं। जहां पर भगवान गणेश की 18 भुजाधारी प्रतिमा विराजमान है। कहा जाता है यह प्रतिमा भारत की पहली प्रतिमा है। पुरातत्व महत्व की। इस प्रतिमा सम्राट अशोक ने भारत भ्रमण किया था। इस स्थान पर पड़ाव लिया गया था। पहले यह मंदिर खंडहर जैसी स्थिति में था। लेकिन अब यहां पर एक भव्य मंदिर बन गया है। राजनीतिक हस्तियों का इस मंदिर से विशेष लगाव है।

धनसरा जबेरा बाजार में प्रतिमाएं
श्री गणेश की धनसरा जबेरा बाजार में भी अति प्राचीन दुर्लभ प्रतिमाएं विराजमान हैं। जहां दर्शनों के लिए दूर-दूर से दर्शनार्थी पहुंचते हैं। गणशोत्सव के 10 दिन तक यहां अनेक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।