देवास. शहर में संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा घोषित विश्व आदिवासी दिवस धूमधाम से मनाया गया। आमु आखा एक छै, जय जोहार आदि नारों के साथ शहर में रैली निकाली गई। शहर से सटे गांवों से पारंपरिक वेशभूषा पहनकर सजी धजी रंगबिरंगी तीर कमान, महिलाएं आदिवासी नाटी पहने, हाथ में फालिया, कमर पर गोफन बांधकर, सिर पर लाल साफा ,गले में आदिवासी पीला गमझा डालकर, पानी की बौछारों के साथ मांदल की थाप व बांसुरी की धुन पर लोकनृत्य करते हुए पीला झंडा और तिरंगा हाथ में लेकर हजारों की संख्या में आदिवासी रैली में शामिल हुए।
ग्राम खेताखेड़ी, क्षिप्रा, भीमसी, नागूखेडी़, बुदासा, खल सहित अन्य जगहों से स्वास्तिक गार्डन भोपाल चौराहा पर समाजजन एकत्रित हुए। सर्वप्रथम समाज के बुजुर्ग डहालो द्वारा ज्वार, नीम के पत्ते ,पानी, हल्दी, खाकरे के पत्तों से पूजा अर्चना कर मां प्रकृति व पुरखों को आमंत्रित किया गया। इसके बाद स्वास्तिक गार्डन से रैली के रूप में कलेक्टर आफिस पहुंचे। वहां मांगों को लेकर राज्यपाल के नाम कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा।ज्ञापन सौंपकर सांस्कृतिक रैली शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए वापस स्वास्तिक गार्डन पहुंची। रैली में जबलपुर, आलीराजपुर, सतवास, उंराव समाज के सांस्कृतिक लोकनृत्य ने आकर्षित किया। इस अवसर पर हजारों की संख्या में जयस, बिरसा ब्रिगेड, आदिवासी एकता परिषद,गोंड महासभा ,आदिवासी छात्र संगठन, आदिवासी मुक्ति मोर्चा संगठन सहित सर्व आदिवासी समाज के समाजजन उपस्थित थे। संचालन राकेश कुमरे व राकेश देवडे़ बिरसावादी ने किया। आभार गोविंद इवने ने माना।
रैली के बाद हुई आमसभा
स्वास्तिक गार्डन में वैचारिक आमसभा हुई। आमसभा को कई बौद्धिक वक्ताओं ने अपना उद्बोधन दिया। राकेश देवडे़ बिरसावादी ने कहा संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में 23 दिसंबर 1994 को पारित प्रस्ताव के तहत 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस अर्थात वर्ल्ड इंडीजनस पीपुल्स डे घोषित किया था। विश्व आदिवासी दिवस मनाने का उद्देश्य यह है कि आदिवासी समाज के मान्य अधिकारों का संरक्षण हो। उनके जल, जंगल, जमीन और खनिज संपदा के अधिकार सुरक्षित रहें व अस्मिता आत्मसम्मान कला संस्कृति अस्तित्व व इतिहास कायम रहे।
मणिपुर में हिंसा बंद हो
लाखन सिंह पर्ते ने कहा आदिवासी समाज की राष्ट्रपति बनने पर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हुआ था लेकिन विश्व आदिवासी दिवस की बधाई तक नहीं दी। भानुप्रताप सिंह उईके ने कहा चाहे कोई भी सरकार हो आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा। जल, जंगल, जमीन के साथ छेड़छाड़ की जा रही है। आदिवासी समाज पर दिन प्रतिदिन शोषण और अत्याचार बढ़ता ही जा रहा है। इसलिए अब वक्त है स्वयं का नेतृत्व खडा़ किया जाए। मणिपुर में हिंसा बंद हो। शांति कायम हो। अनिल बरला, प्रीतम बामनिया, दियालसिंह उईके आदि ने संबेाधित किया।