मोदी 2.0: भारत की विदेश नीति की राह में रोड़ा बन सकते हैं अमरीका व चीन, ये देश भी हैं चुनौतीपूर्ण

  • ईरान पर अमरीका की तल्खी के बाद भारत के लिए बढ़ी मुश्किलें।
  • साल 2030 तक दुनिया का सबसे बड़ा कंज्यूमर मार्केट होगा भारत।
  • वैश्विक मुद्दों पर भी भारत को होना होगा मुखर।

By: Ashutosh Verma

Updated: 28 May 2019, 06:22 PM IST

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी ( BJP ) की अगुवाई वाली एनडीए ( NDA ) की प्रचंड बहुमत के बाद अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ( Narendra Modi ) के लिए विदेश नीति ( Forign Policy ) को लेकर कई बड़ी चुनौतियां खडी हैं। अमरीका व चीन के बीच चल रहे ट्रेड वॉर ( Trade War ) और ईरान ( Iran ) के खिलाफ ट्रंप प्रशासन की बढ़ती तल्खी भारत के विदेश नीतियों की राह में रोड़ा बन सकती है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढऩे वाला अर्थव्यवस्था ( Indian economy ) है। ईरान से कच्चा तेल ( crude oil ) आयात करना भारत के लिए सबसे सस्ता स्त्रोत है। ऐसे में लगातार दूसरी बार सत्ता पर काबिज होने वाली मोदी सरकार के लिए दक्षिण एशिया में अपने व्यापारिक वर्चस्व को कायम रख पाना चुनौतीपूर्ण होगा।


मोदी की जीत पर दुनियाभर के नेताओं की बधाई का मतलब

मोदी की इस जबरदस्त जीत के बाद कई दिग्गज देशों के नेताओं ने उन्हें व्यक्तिगत रूप से फोन या ट्वीट कर बधाई दी है। इनमें अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप , चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग , रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतीन, इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू शामिल हैं। अमरीका के वॉशिंगटन में भारत के पूर्व राजदूत ललित मानसिंह का कहना है कि पिछले कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उनकी विदेशी नीति सबसे अधिक सफल रही है। पहली बार किसी प्रधानमंत्री में विदेश नीति को लेकर इतना आक्रामक रवैया देखने को मिला है।

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विदेश नीति को लेकर मोदी के लिए बड़ी चुनौती

अब जब नरेंद्र मोदी एक बार फिर सत्ता पर काबिज होने में सफल हो चुके हैं, ऐसे में कई वैश्विक लीडर्स भारत की तरफ उम्मीद की नजर से देख रहे हैं। इंडो-प्रशांत क्षेत्र में सिक्योरिटी बफर, जलवायु परिवर्तन को लेकर सतर्कता और वैश्विक बाजार पर भारत की पकड़ जैसे कुछ मुद्दे होंगे जिनपर प्रधानमंत्री को खासा ध्यान देना होगा। सेवानिवृत हो चुके कूटनीतिज्ञ दिलीप सिन्हा ने कहा, "मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस बार विदेश नीति के मोर्चे पर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।"


चीन को लेकर भारत से क्या चाहता है अमरीका

एक तरफ अमरीका चाहता है कि एशियाई बाजारों में बीजिंग के वर्चस्व को खत्म करने के लिए भारत और आक्रामक हो। वहीं, दूसरी तरफ मोदी प्रशासन से वो यह भी चाहता है कि भारत ट्रेड बैरियर को कम करे। इस माह के शुरुआत में ही अमरीकी कॉमर्स सचिव विल्बर रॉस ने नई दिल्ली से शिकायत की है कि टैरिफ और नियामकीय प्रावधानों के चलते अमरीकी कंपनियों को भारत में पहुंच बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

ट्रेड असंतुलन को कम करने के लिए भारत ने अमरीका के साथ 15 अरब डॉलर के डिफेंस कॉन्ट्रैक्ट पर हस्ताक्षर किया है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कंज्यूमर मार्केट बनने जा रहा है। भारतीय कंज्यूमर मार्केट मौजूदा 1.5 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर साल 2030 तक 6 ट्रिलियन डॉलर का होने जा रहा है।

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खाड़ी देश भी महत्वपूर्ण

सिन्हा ने आगे कहा, "खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव को देखते हुए कहा जा सकता है कि भविष्य में भारत के लिए कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा होगा। इसके साथ ही, माइग्रेंट लेबर के तौर पर काम करने वाले करीब 70 लाख मजदूरों की नौकरियों पर खतरा मंडरा सकता है।"


रूस का रूख

शीत युद्ध (कोल्ड वॉर ) के समय भारत व इजरायल के बीच कुछ खास संबंध नहीं रहे थे। उस दौरान भारत प्रमुख तौर पर पेलेस्टीन के पाले में था। लेकिन, बीते 25 सालों में भारत व इजरायल के बीच संबंध में गर्मी देखने को मिली है। साल 1992 की तुलना में इन देशों में ट्रेड 20 करोड़ डॉलर से बढ़कर साल 2016 तक 4.16 अरब डॉलर हो गया है। अमरीका से हथियारों की खरीदारी के बाद रूस ने पाकिस्तान और चीन से संबंध बेहतर किया है। कोल्ड वॉर के दौरान से ही भारत व रूस के बीच जो संबंध बेहतर हुए थे, वो अब ठंडा पड़ते दिखाई दे रहा है।

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दक्षिण एशियाई देशों का भी दिल जीतना होगा

पूर्वोत्तर सीमाओं के लिए चीन भारत के सबसे बड़ा चुनौती बना हुआ है। यहां पर बीजिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने के लिए अरबों रुपए का निवेश कर रहा है। दक्षिण एशिया को ध्यान में रखते हुए श्रीलंका, बांग्लादेश, भुटान, नेपाल और मालदीव के साथ भारत को रिश्ते और भी बेहतर करने होंगे। कई प्रोजेक्ट्स के लिए भारत द्वारा की जाने वाली देरी के बाद इन देशों का रूख चीन की तरफ बढ़ता जा रहा है। हालांकि, 2017 में बॉर्डर के तनाव के बाद मोदी ने शी जिनपिंग के साथ संबंधों को लेकर सावधानी बरती है।


आतंक से परे कैसा होगा भारत-पाक का रिश्ता

साल 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद पर शपथ लेने के दौरान मोदी ने तात्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी बुलाया था। हाल में पहले आतंकी हमले और फिर एयरस्ट्राइक के बाद दोनों देशों के बीच संबंध खराब हुए हैं। भारतीय प्रधानमंत्री ने इस्लामाबाद से तब तक के लिए किसी भी बातचीत के लिए इन्कार कर दिया है, जब तक पाकिस्तान अपनी जमीन पर आतंक को पनाह देगा।

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