
स्मृति शेष : यह दृश्य 1979 का है, जब आचार्य श्री विद्यासागर महाराज गुना में एडवोकेट पूरनचंद जैन के घर आहार के लिए पहुंचे थे।,सन् 1979 में गुना आए थे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज,सन् 1979 में गुना आए थे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज
गुना। जैन मुनि विद्यासागर एक ऐसे संत थे, जिनके जैन समाज ही नही बल्कि दूसरे समाजों के लोग भी अनुयायी थे। डोंगरगढ़ में उनके शरीर त्यागने की खबर गुना में भी तेजी से फैली। जिसके बाद उनके अनुयायियों में शोक की लहर दौड़ गई। इस अवसर पर गुना के अधिकतर प्रतिष्ठान बंद रहे। वहीं रविवार को देर शाम अलग-अलग जगह कार्यक्रम हुए, जहां उनको विनयाजंलि दी गई। इससे पूर्व सुबह के समय जैन मंदिरों में पूजा और शांति विधान जैसे कार्यक्रम भी होते रहे। वहीं छत्तीसगढ़ के डोंगर क्षेत्र में उनके समाधि लिए जाने और अंतिम संस्कार कार्यक्रम में गुना से लगभग सौ से अधिक लोग अल सुबह रवाना हो गए थे। उनके नाम पर एबी रोड पर दयोदय गोशाला, संत सुधा सागर पब्लिक स्कूल बनाया गया है। विद्यासागर महाराज गुना में केवल एक बार पांच संतों के साथ यानि सन् 1979 में सदर बाजार स्थित छोटे जैन मंदिर में आयोजित एक कार्यक्रम में शामिल होने आए थे। वे चार-पांच घंटे यहां रुकने के बाद अशोकनगर के लिए विहार कर गए थे।
गुना के दिगंबर जैन समाज अध्यक्ष संजय कामिनी बताते हैं कि सन् 1979 में जून माह में विद्यासागर महाराज अल्प प्रवास पर गुना के सदर बाजार स्थित छोटे जैन मंदिर आए थे। यहां उन्होंने धर्मसभा को संबोधित किया। जिसमें तत्कालीन कलेक्टर संतराम मिश्र भी मौजूद रहे थे। धर्मसभा को संबोधित करने के बाद विद्यासागर महाराज ने एडवोकेट पूरन चन्द्र जैन के यहां आहार किया। इसके बाद अशोकनगर के लिए विहार कर गए। पांच साल पूर्व वे मुंगावली भी आए थे। खास बात ये है कि विद्यासागर जी के नाम से जो पाठशाला खुली हैं उनमें गुना की दीदियां सबसे ज्यादा पदस्थ हैं।
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विद्यासागर जी कहते थे देश को इंडिया नहीं भारत कहो
विद्यासागर महाराज के अनुयायी अभिजीत गोयल ने बताया कि विद्यासागर महाराज को केवल जैन संत कहना सही नहीं होगा, क्योंकि उनके विचारों से हर वर्ग के लोग प्रभावित थे। विद्यासागर महाराज हमेशा कहते रहे कि हमारे देश का नाम भारत है, इंडिया नहीं। इसलिए हमेशा भारत ही कहें। इसके अलावा देश की मातृ भाषा हिंदी बोलने पर भी उन्होंने जोर दिया। इसके अलावा वे चाहते थे कि हर व्यक्ति आत्मनिर्भर हो इसलिए उन्होंने हथकरघा को अपनाने के लिए कहा। लोगों को खादी के कपड़े पहनने के लिए प्रेरित किया।
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विद्यासागर महाराज ने आखिरी आहार गुना के मनोज कटपीस से लिया
जैन समाज के अध्यक्ष ने बताया कि छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ में आचार्य विद्यासागर महाराज ने आखिरी आहार गुना के मनोज कटपीस परिवार से लिया। जबकि गुना से करीब 20 लोग चौका लेकर डोंगरगढ़ से पहुंचे थे। बताया जाता है कि महाराज जी के आहार ग्रहण करने की प्रक्रिया काफी कठिन है। यदि मुनि श्री द्वारा ली गई विधि पूर्ण नहीं होती थी तो वे उस दिन आहार ही नहीं लेते। जिस समय वह भोजन कर रहे होते थे उस अंजलि में बाल आ जाए, जीव आ जाए, उस समय अपशब्द बोल दे तो आगे का भोजन नहीं करते। पानी भी ग्रहण नहीं करते।
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कामिनी परिवार को मिला सबसे ज्यादा बार आहार देने का सौभाग्य
संजय कामिनी ने पत्रिका को बताया कि संत विद्यासागर महाराज गुना में भले ही एक बार 1979 में आए थे। उस समय उन्हें आहार देने का मौका नहीं मिला। लेकिन इसके अलावा छत्तीसगढ़ के डोंगर, कुंडलपुर, नेमावर, इंदौर, जबलपुर सहित अन्य स्थानों पर महाराज जी को आहार देने का सौभाग्य मिला है। महाराज की धर्मप्रभावना का उनके परिवार पर गहरा असर है। वे स्वयं अजीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर रहे हैं। वर्ष 2013 में मुनि सुधासागर महाराज चातुर्मास पर आए थे तब उन्होंने दीक्षा ग्रहण की थी। उनके परिवार की 6 बहनें ब्रह्मचारिणी हैंं। एक बहन आर्यिका माताजी हैं। चाचा के लड़के मुनि महाराज हैं। इसके अलावा 2017 में पंच कल्याणक महोत्सव हुआ था तब उनके परिवार के सदस्यों को माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था।
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सबसे हटकर है गोशाला
जैन समाज से जुड़े अखिलेश जैन बताते हैं कि संत विद्यासागर महाराज के अनुयायी जैन समाज के नहीं बल्कि दूसरे समाजों के भी हैं। एबी रोड पर विद्या सागर जी के नाम से एक गौशाला बनी है, उसकी देखरेख हमारी संस्था करती है। यह गौशाला सबसे हटकर है।विद्यासागर महाराज को उनके अनुयायी कभी नहीं भूल सकते।
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आचार्यश्री की धर्मप्रभावना
संत विद्यासागर महाराज ने मूक माटी नाम का महाकाव्य लिखा था। जिसमें मिट्टी से भगवान और कंकर से शंकर बनने की व्याख्या की गई है। इसमें हजारों लोगों की थिसेस लिखी गई है। इस विषय पर कई लोग पीएचडी भी कर चुके हैं।
-विद्यासागर महाराज की गुना जिले में इतनी धर्म प्रभावना थी कि यहां के कई जैन परिवारों के कई सदस्य मुनि और आर्यिका बने। इनमें 80 बहनें ऐसी हैं जिन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत लिया है। गुना ब्लॉक से 8 बहनें, आरोन से 4 माताजी, 2 महाराज जी, राघौगढ़ से 1 महाराज जी ने संयम का मार्ग चुना है।
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-ऐसे चलते रहे निरंतर कार्यक्रम
संत विद्यासागर महाराज ने जैसे ही आचार्य पद त्याग कर तीन दिन का उपवास और मौन धारण किया। इसके बाद शाम 4 बजे से गुना के जैन मंदिर में णमोकार पाठ चालू हो गया। रात्रि ढाई बजे शरीर त्यागने की जानकारी लगने के बाद तक पाठ जारी रहा। सुबह के समय भगवान की आराधना की गई। बड़े जैन मंदिर पर एलइडी लगाकर छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ से लाइव प्रसारण देखने बड़ी संख्या में जैन श्रद्धालु मौजूद रहे। इसके बाद शाम 7 से 9 बजे तक चौधरन कॉलोनी स्थित आचार्य विद्यासागर महाराज के नाम से बने कीर्ति स्तंभ पर दीप प्रज्जलन हुआ।
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णमोकार पाठ भी हुआ
शनिवार को शाम 4 बजे अखंड णमोकार पाठ चालू हो गया था, रात्रि ढाई बजे समाचार मिला, पाठ निरंतर चलता रहा। सुबह भगवान की अराधना की। इसके बाद बड़े जैन मंदिर पर एलइडी लगाकर अनुयायियों ने डोंगरगढ़ का सीधा प्रसारण देखा। दिन भर बाजार में प्रतिष्ठान बंद रखे। जैनेतर समाज ने भी गुना का व्यापार बंद रखा।
Published on:
19 Feb 2024 01:19 pm
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