
भोजन का ठेका, फिर भी थाली मांजते हैं प्रतिदिन स्कूली बच्चे
गुना। जिले से सटे हरिपुर गांव में शासकीय हाईस्कूल। कुछ बच्चे टाटपट्टी पर बैठकर मध्यान्ह भोजन कर रहे थे ता कुछ हाथों में खाने की थालियां लेकर उसको धोने के लिए स्कूल परिसर में लगे नल पर भीड़-भाड़। यह नजारा देखकर जब स्कूल प्रबंधन से पूछा गया तो यूं सफाई देते हुए कहा कि क्या करें, कौन मांजेगा बर्तन। स्कूल में भोजन बनाने का ठेका है, बर्तन मांजने का नहीं। सभी स्कूलों में बच्चे ही अपनी थाली धो रहे हैं। इससे पूर्व इस विद्यालय परिसर में बुखार आते बच्चे को जैसे ही वैक्सीन लगी, बच्चा बेहोश हो गया, यह देखकर स्कूल प्रबंधन घबड़ा गया था और अफरा तफरी मची हुई थी।स्कूल प्रबंधन और वैक्सीन लगाने वाली टीम की गलती ये कि न तो उसने बच्चे से बुखार आने के बारे में पूछा न बच्चे ने बताया। इसके बाद तो वहां वैक्सीन लगाने वाली टीम अपनी जान बचाकर गुना भाग आई। इससे शिक्षक-शिक्षिकाएं और बच्चे सहमे हुए दिखाई दे रहे थे।
सूत्रों ने बताया कि स्कूल शिक्षा विभाग के नियमानुसार तीस बच्चों पर एक शिक्षक रखे जाने का है। इस हिसाब से स्कूलों में शिक्षक तैनात नहीं किए हैं। किसी स्कूल मेंं अध्यापक ज्यादा हैं तो कहीं बच्चे ज्यादा हैं तो शिक्षक कम हैं। सरप्लस टीचरों को हटाने की कार्रवाई स्कूल शिक्षा विभाग अभी तक नहीं कर पाया है। शहर से नजदीक स्कूलों को छोड़कर शिक्षक-शिक्षिकाएं दूर-दराज क्षेत्र के स्कूल जहां उनकी मूल स्थापना है, वहां ये लोग नहीं जाना जाते। उधर मध्यान्ह भोजन बनाने वाले स्व सहायता समूह को शासन की ओर से प्रति बच्चा प्रति दिन 4 रुपए 90 पैसे और सौ ग्राम गेहूं मिलता है। लेकिन मध्यान्ह भोजन के नाम पर अधिकतर विद्यालयों में पानीयुक्त सब्जी और कच्ची रोटियां खिलाई जा रही हैं, ऐसा करके स्व सहायता समूह व स्कूल प्रबंधन हर माह हजारों रुपए की आर्थिक चपत लगा रहा है।
पत्रिका टीम बुधवार को जब हरिपुर स्थित एकीकृत शासकीय हाईस्कूल में पहुंची तो वहां कक्षा एक से कक्षा दस तक कक्षाएं लगती मिलीं।इस विद्यालय में 442 बच्चे अध्ययनरत हैं, अभी आधे से भी कम बच्चे पढऩे आ रहेे हैं। जिनको पढ़ाने के लिए 18 टीचर पदस्थ हैं।एक अलग से सफाई कर्मी भी है। इस विद्यालय में स्थायी प्राचार्य नहीं होने से प्रभारी प्राचार्य के रूप में नीतू श्रीवास्तव को पदस्थ किया है, वे भी अवकाश पर हैं तो प्रभारी प्राचार्य का पद पूनम पाठक संभाले हुए मिलीं। जब यहां के स्टॉफ से बच्चों द्वारा थाली मांजने के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि इस गांव का अलग माहौल है, यहां के बच्चे अभी भी छुआछूत मानते हैं, इस वजह से भी बच्चों को अपनी थाली मांजना पड़ती हैं। उनसे जब पूछा गया कि थाली मांजने का काम तो मध्यान्ह भोजन सप्लाई करने वाला का है, तो इसका वे कोई जवाब नहीं दे पाए। इस विद्यालय के पास कमरों का अभाव देखा गया।स्मार्ट क्लास रूम यहां बना हुआ है, उसमें सुबह के समय वैक्सीन चलना बताया, दरवाजे लगे होने पर उनका कहना था कि अशोक अहिरवार को वैक्सीन लगने पर बेहोश हो गया था, यह देखकर वैक्सीन लगाने वाली टीम भी गुना वापस चली गई।
सिंघाड़ी में चलती मिलीं कक्षाएं
पत्रिका टीम बुधवार को करीब दो बजे शासकीय प्राथमिक विद्यालय सिंघाड़ी पहुंची तो वहां कक्षाएं लगती मिलीं, यहां के प्रधानाध्यापक अनवर खान बताते हैं कि यहां स्कूली नियम अनुसार 74 बच्चों पर तीन शिक्षक होना बताया। इस विद्यालय में मध्यान्ह भोजन के रूप में आलू की सब्जी और रोटी आई हुई थी। इस विद्यालय में हजारों रुपए खर्च कर पानी के लिए नल आदि लगवाए थे, लेकिन चोर उन नल और पाइप लाइन को ही उखाड़ ले गए।
बारिश में तो बंद ही हो जाता है विद्यालय
पत्रिका टीम जब शासकीय मिडिल एकीकृत स्कूल पहुंची तो वहां के प्रवेश द्वार पर पानी की समुचित निकासी न होने से गंदा पानी भरा हुआ नजर आया। इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक पन्नालाल मोंगिया के अनुसार हमारे विद्यालय में कक्षा एक से आठ तक में 195 बच्चे पढ़ते हैं जिनमें कक्षा छह से आठ तक के बच्चों को पढ़ाने के लिए चार और कक्षा एक से पांच तक पढ़ाने के लिए पांच शिक्षक पदस्थ हैं। बच्चों की संख्या के हिसाब से दो शिक्षक सरप्लस होना बताए। इस विद्यालय से सटे एक सहरिया परिवार के एक व्यक्ति की हरकत से वहां का महिला स्टाफ ज्यादा परेशान है, इसकी शिकायत धरनावदा पुलिस को की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। सबसे बड़ी परेशानी यहां बारिश के समय की बताई, सड़क से नीचेे बनी सर्विस लाइन वाले रास्ते पर बने होने से बारिश के समय तो स्कूल भवन डूब जाता है, जिससे कई दिन तक छुट्टी करना पड़ती है। कभी-कभी ऑफिस में कक्षा लगानी पड़ती है। विद्यालय भवन को पुन: बनाने की लंबे समय से पत्राचार चल रहे हैं लेकिन कोई सुनने को तैयार नहीं है। उधर भोजन बनाने वाले समूह की महिलाएं झूठी थालियां मांजती हुई दिखाई दीं। यहां सभी शिक्षक-शिक्षिका उपस्थित थे।
बच्ची में दिखी पढऩे की ललक
गुर्जर बाहुल्य सूकेत गांव जहां के लोग अपनी बच्चियों को बहुत कम पढ़ाते हैं। लेकिन यहां की एक बच्ची में पढऩे की ललक इस कदर देखी कि वह बच्ची प्रतिदिन अपने पिता के साथ स्कूल आती है। सबसे बड़ी बात ये है कि वह स्कूल की तरफ से मिलने वाला मध्यान्ह भोजन न कर घर से लाए खाने को खाती है। वहां के स्टॉफ का कहना था कि बच्चे तो यहां पढऩे के लिए वहां के लोग भेजते हैं मगर बच्चियों को नहीं। इस बार हमने प्रेरित किया तो एक परिवार लगातार अपनी बच्ची को यहां पढऩे भेज रहा है।
Published on:
06 Jan 2022 01:52 am
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