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-पहचान के लिए परेशान हो रहा है खेरुआ-गौड़-आदिवासी समाज, अफसरों ने बदल दी पच्चीस हजार बाप-बेटों की जाति

- खेरुआ गौड़-आदिवासी समाज के लोग अब हो रहे आक्रमक अगस्त में कर सकते हैं बड़ा आंदोलन केस वन जिले की भैंरों घाटी के रहने वाले मथुरा लाल जिनके पास गौड़-आदिवासी वर्ग से होने की वजह से अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र है। मगर उसके बेटे को सरकार ने पिछड़ा वर्ग का मानकर उसको प्रमाण पत्र दे दिया। केस टू बमौरी ब्लॉक में रहने वाले अमृत कहते हंै कि यह कैसी सरकार है जिसने बाप-बेटी को अलग-अलग जाति में बांट दिया और मेरे पास अनुसूचित जनजाति का प्रमाण पत्र है। बेटे को पिछड़ा वर्ग का प्रमाण पत्र अधिकारियों ने दे

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गुना

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Praveen Mishra

Jul 16, 2021

-पहचान के लिए परेशान हो रहा है खेरुआ-गौड़-आदिवासी समाज, अफसरों ने बदल दी पच्चीस हजार बाप-बेटों की जाति

-पहचान के लिए परेशान हो रहा है खेरुआ-गौड़-आदिवासी समाज, अफसरों ने बदल दी पच्चीस हजार बाप-बेटों की जाति


गुना। प्रदेश सरकार के एक आदेश की सजा जिले के लगभग 25 हजार गौड़-आदिवासी समाज के लोग भुगत रहे हैं। इसका परिणाम ये है कि उस आदेश से उनकी और उनके पुत्र की अलग-अलग जाति हो गई है। जिसकी वजह से उनके पुत्रों को शासन की किसी भी योजना का लाभ अनुसूचित जनजाति में न आने से नहीं मिल पा रहा है। उनके पुत्रों को गौड़-आदिवासी ही माना जाए, इसके लिए जिले से लेकर राजधानी तक इस मांग को लेकर लड़ाई लड़ चुके हैं,राजनेता कई बार आश्वासन दे चुके हैं, इस सबके बाद भी अभी तक उनको कहीं से भी न्याय नहीं मिल रहा है। एक बार फिर गौड़-आदिवासी समाज अपनी पहचान को लेकर आक्रामक होता जा रहा है, समाज की एक बैठक में निर्णय किया कि एक माह के भीतर सुनवाई नहीं कर हमारी पुरानी पहचान नहीं लौटाई तो अगस्त माह में जंगी आंदेालन की शुरूआत गुना से हो सकती है।
सूत्रों ने बताया कि गुना जिले के बमौरी, गुना जनपद पंचायत आदि में लगभग 25 हजार गौड़-आदिवासी समाज के लोग निवास करते हैं। सन् 2002 से पूर्व इस समाज के लोगों को गौड़-आदिवासी जाति का माना जाता था। भारत सरकार की अनुसूचित जाति की अनुसूचित में सोलह नम्बर पर इनको गौड़-आदिवासी समाज के होने के रूप में दर्ज किया गया था। सन् 2002 से पूर्व से लेकर अभी तक इनको अनुसूचित जनजाति के रूप में माना जाता रहा और इनको प्रमाण पत्र दिया गया था।

प्रदेश सरकार ने माना पिछड़ा वर्ग
सूत्र बताते हैं कि प्रदेश सरकार ने गौड़-आदिवासी जाति के लोगों को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल न कर उनको पिछड़ा वर्ग में माना। कुछ समय से तो यह हाल हो गया कि अधिकतर अधिकारियों ने उनको पिछड़ा वर्ग न मानकर सामान्य बताया जाने लगा।
बाहर हो गए अजा जनजाति वर्ग से
बताया जाता है कि भारत सरकार और प्रदेश सरकार की जाति अनुसूचि में अलग-अलग श्रेणी में शामिल होने का नतीजा यह रहा कि इन समाज के लोग अनुसूचित जनजाति वर्ग को मिलने वाले लाभ से बाहर हो गए। इससे उनका आर्थिक नुकसान हो रहा है।
अब पिता और पुत्र अलग-अलग जाति के
मजेदार बात तो ये है कि जिले के गौड़-आदिवासी वर्ग के लोगों की पीड़ा ये है कि पिता-पुत्र की जाति कैसे-कैसे अलग-अलग हो सकती है। सरकार को हमारे पुत्रों की जाति गौड़-आदिवासी मानकर भारत सरकार की जाति अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए।
हम करत हते कत्था को काम
गौड़-आदिवासी समाज से जुड़े और खेरुआ गौड़ आदिवासी संघर्ष समिति के संयोजक पूरन सिंह गौड़, भजन सिंह गौड़, भगवान लाल गौड़ आदि ने पत्रिका को अपना दर्द सुनाते हुए कहा कि साहब हम कत्था को काम करत हते, हम गौड़-आदिवासी जात में आत हैं।जहां के अफसरन ने हम बाप-बेटा की जात ही बदल दई, हम अब भी गौड़-आदिवासी हैं मगर हमाओ बेटा पिछड़ी जाति का हो गओ है काहे कि वा का प्रमाण पत्र अफसरन ने पिछड़ी जाति को बनाओ दओ है। हम लोगों को जिला प्रशासन गौड़-आदिवासी जाति के मानकर उसका प्रमाण पत्र देता रहा। शासन की नई गाइड लाइन ऐसी आई जिसने हमें पिछड़ी जाति का माना और पिता-पुत्र की जाति बदल दी। उधर भारतीय मजदूर
संघ से जुड़े धर्म स्वरूप भार्गव कहते हैं कि बमौरी जैसे कई ब्लॉकों में एक नहीं गौड़ आदिवासी समाज के हजारों लोग यहां निवास करते हैं जिन पर जाति प्रमाण पत्र तक हैं इनके बच्चों को अनुसूचित जनजाति में शामिल किया जाना चाहिए। इनकी लड़ाई हम हर स्तर पर लड़ रहे हैं और इनको न्याय दिलाकर ही रहेंंगे।
कई बार ज्ञापन दिए, बैठकें हुई नतीजा सिफर
गौड़-आदिवासी वर्ग के इन लोगों को न्याय दिलाने की लड़ाई भारतीय मजदूर संघ के नेता धर्म स्वरूप भार्गव के नेतृत्व में लंबे समय से चल रही है, इसके लिए ज्ञापन दिए, मगर अभी तक प्रदेश सरकार अपने निर्णय में संशोधन नहीं कर पाई। जबकि विधानसभा उपचुनाव के समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बमौरी में इस समाज की मांग को लेकर जल्द कार्रवाई कराने का भरोसा दिलाया था, लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। इस मांग को लेकर राजनेता भी अपने-अपने स्तर पर प्रयास किए, मगर इस जाति को अपनी पुरानी पहचान कोई नहीं दिला पाया।दो साल पहले जाति बदलने को लेकर हुई कागजी कार्रवाई के बाद यहां सामान्य प्रशासन विभाग के तत्कालीन अवर सचिव केके कातिया के नेतृत्व में उच्च अधिकारियों की एक टीम आई थी, जिसने प्रमाण पत्र देखने के बाद माना था कि यह गौड़-आदिवासी समाज के हैं, इसके बाद कागजी कार्रवाई चली, जो बाद में थम गई।