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डॉक्टर्स-डे पर विशेष : नौकरी समझकर नहीं सेवाभाव के साथ किया काम

- जिला अस्पताल के कोविड वार्ड में तैनात थी सबसे युवा टीम- एक-एक दिन में 10 मरीजों की मौत होने के बावजूद नहीं हारने दी हिम्मत- मरीजों को महसूस नहीं होने दी परिवार के सदस्यों की कमी, दवा के साथ हौसला भी दिया

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डॉक्टर्स-डे पर विशेष : नौकरी समझकर नहीं सेवाभाव के साथ किया काम

डॉक्टर्स-डे पर विशेष : नौकरी समझकर नहीं सेवाभाव के साथ किया काम

गुना. यदि किसी कठिन काम को चुनौती के रूप में लेकर नौकरी न समझकर सेवा भाव से किया जाए तो वह काम न सिर्फ आसान हो जाता है बल्कि मन और शरीर को थकाने की वजाए ऊर्जा देने का काम करता है। इस सोच को व्यवहारिक रूप से प्रेक्टीकल कर दिखाया है जिला अस्पताल के कोविड वार्ड की टीम ने। जिसके नेतृत्वकर्ता हैं डॉ सुनील यादव एमडी। जिन्होंने अपने 6 डॉक्टर्स की टीम के साथ दो सालों में सैकड़ों मरीजों को स्वस्थ कर घर भेज दिया। यहां बता दें कि डॉ यादव को अगस्त 2020 में ऐेसे समय में कोविड वार्ड का इंचार्ज बनाया था, जब कोरोना पॉजिटिव केसों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही थी। यह कोरोना की पहली लहर थी इसलिए डॉक्टर्स हों या आम आदमी हर व्यक्ति के मन में कोरोना को लेकर डर बना हुआ था। कई डॉक्टर्स तो कोरोना के खौफ से कोविड वार्ड की जिम्मेदारी लेने से भी बच रहे थे और इसमें वह कामयाब भी हो गए। लेकिन डॉ सुनील यादव ने आरोन से जिला अस्पताल आते ही सबसे पहले कोविड वार्ड की जिम्मेदारी संभाली। उन्होंंने गंभीर से गंभीर मरीजों को देखा और उन्हें ठीक किया। उन्होंने कभी भी अपने काम से स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन को यह एहसास नहीं होने दिया कि उन्हें इस काम में जरा भी परेशानी आ रही हो।
अप्रैल से मई के बीच एक समय ऐसा भी आया जब सरकारी से लेकर निजी अस्पताल में प्रतिदिन भर्ती मरीजों की मरने की संख्या 10 औसतन हो गई थी। वार्ड में प्रतिदिन भर्ती होने वाले कुल मरीजों में 15 ऐसे थे जिन्हें ऑक्सीजन की जरूरत थी। लेकिन उस समय पर्याप्त ऑक्सीजन की उपलब्धता भी नहीं थी। हर समय विवाद की स्थिति उत्पन्न हो रही थीं। ऐसे कठिन हालातों में भी डॉ यादव ने न सिर्फ अपना हौसला बनाए रखा बल्कि अपनी युवा टीम को कभी संयम नहीं खोने दिया। यहां तक कि एक बार तो एक मरीज की मौत के बाद उसके बेटे ने कोविड वार्ड में जमकर तोडफ़ोड़ करते हुए डॉक्टर व स्टाफ से अभद्रता तक कर दी थी। इस घटना के बाद भी डॉक्टर यादव की टीम का जरा भी हौसला कम नहीं हुआ। उन्होंने इस घटना को ड्यूटी का एक हिस्सा मानते हुए सभी मरीजों का पूर्ण जिम्मेदारी के साथ इलाज किया।
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महमारी के दौरान कई जोखिम भी उठाने पड़े
कोरोना महामारी के भयंकर दौर में डॉक्टर्स को मरीजों के इलाज करने के लिए कई तरह के जोखिम भी उठाने पड़े हैं। डॉ यादव ने बताया कि मई माह में एक समय भर्ती मरीजों की संख्या 140 तक पहुंच गई थी। जो वर्तमान क्षमता से काफी अधिक थी। इसी दौरान उनके स्टाफ के 10 लोग कोरोना संक्रमित हो गए। उन्हें मजबूरीवश होम आइसोलेट होना पड़ा। ऐसे में बेहद कम स्टाफ से ज्यादा काम लेना पड़ा। जिसे निर्धारित 8 घंटे की जगह 12 घंटे तक यहां तक कि नाइट में भी ड्यूटी करनी पड़ी है। इसके अलावा ऐसा कठिन दौर भी आया जब भर्ती मरीजों को ऑक्सीजन की मांग बढ़ गई और आपूर्ति कम हो गई। ऐसे में मरीजों को दी जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा को नियंत्रित कर अन्य मरीजों को ऑक्सीजन देना पड़ी। यह काम बेहद जोखिम भरा था।
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बिना पीपीई किट पहने ही मरीजों को अटैंड करना पड़ा
कोरोना की दूसरी लहर ने डॉक्टर्स के समक्ष कई बार ऐसे हालात भी निर्मित किए जब उन्हें अपनी जान की परवाह किए बगैर बिना पीपीई किट पहने की गंभीर मरीजों को अटेंड करना पड़ा। डॉ यादव बताते हैं कि जब हम वार्ड में राउंड लेेने जाते हैं तब तो पीपीई किट पहनकर ही जाते हैं लेकिन मई माह के दौरान ऐसे कई बार मौके आए जब उन्हें बिना पीपीई किट पहने ही मरीजों को देखना पड़ा। क्योंकि उस समय के हालात बिल्कुल बेहद गंभीर थे। पीपीई किट को ठीक से पहनने में ही 5 से 7 मिनट लग जाते हैं जबकि गंभीर मरीज के लिए एक मिनट की देरी भी बहुत ज्यादा होती है।
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बीमार भी हुआ, घर में शादी थी लेकिन 2 साल में एक भी अवकाश नहीं
डॉ सुनील यादव जिला अस्पताल के इकलौते ऐसे चिकित्सक हैं जिन्होंने अगस्त 2020 मेें कोविड वार्ड ज्वाइंन करने के बाद से अभी तक एक भी दिन का अवकाश नहीं लिया है। जबकि वे इस दौरान कई बार बीमार भी हो चुके हैं। इस दौरान उन्होंने लगातार दवा लेकर अपनी ड्यूटी निभाई। यही नहीं मरीजों के प्रति सेवाभाव इतना ज्यादा था कि उनके परिवार में शादी होने के बावजूद उन्होंने अवकाश नहीं लिया। पहले मरीजों का इलाज किया बाद में शादी को भी अटैंड किया।
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इलाज में इनोवेशन :
एनआरएम मास्क का उपयोग : ऑक्सीजन का वेस्टेज कम करने एनआरएम मास्क का उपयोग किया गया। डॉ यादव के अनुसार यह मास्क 1 से 2 लीटर ऑक्सीजन के वेस्टेज को कम करने में सहायक होता है।
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ऑक्सीजन सप्लाई के हिसाब से मरीजों की शिफ्टिंग : मई माह में दौरान कोविड वार्ड में सबसे गंभीर हालात थे। यहां कुल 140 भर्ती मरीजों में 70 प्रतिशत मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत थी। मांग के अनुरूप ऑक्सीजन की आपूर्ति नहीं थी। ऐसे में सभी मरीजों को ऑक्सीजन उपलब्ध कराना बेहद चुनौतीपूर्ण काम था। इस कठिन दौर में डॉ यादव ने इलाज में इनोवेशन करते हुए ऑक्सीजन बचाने के लिए एक तरकीब निकाली, जो बेहद जोखिम भरी भी थी। वार्ड में ऑक्सीजन सप्लाई के अलग-अलग प्वाइंट लगे हुए थे। जिनमें ऑक्सीजन की मात्रा अलग-अलग थी। इसका उपयोग करते हुए पहले ऐसे मरीजों को चिन्हित किया गया जिन्हें कम ऑक्सीजन लेवल की जरूरत है, उन्हें दूसरी लाइन में शिफ्ट किया गया। यह काम अतिरिक्त मेहनत और जोखिम भरा था। एक स्टाफ को मॉनीटरिंग के लिए मरीज के पास ही काफी समय तक खड़ा रहना पड़ता था।
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ये है कोविड वार्ड की सबसे युवा टीम
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डॉ सुनील यादव (एमडी) कोविड वार्ड इंचार्ज
ज्वाइनिंग डेट : अगस्त 2020
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डॉ नसरीन जफर आयुष मेडिकल ऑफीसर
ज्वाइनिंग डेट : जुलाई 2020
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डॉ सुदर्शन कुशवाह एमबीबीएस
ज्वाइनिंग डेट : अप्रैल 2021
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डॉ निशा धाकड़ एमबीबीएस
ज्वाइनिंग डेट : अप्रैल 2021
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डॉ चित्रांशु एमबीबीएस
ज्वाइनिंग डेट : अप्रैल 2021
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कोरोना के खिलाफ जंग में उतरने वाले पहले योद्धा थे डॉ कांसल
गुना जिले में डॉ रीतेश कांसल एक ऐसा नाम है, जिनके बारे में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो उन्हें न जानता हो। डॉ कांसल ईएनटी विशेषज्ञ हैं। जो पहली बार तब सुर्खियों में आए जब उन्हें कोरोना के खिलाफ जंग में इंदौर जाने का आदेश प्राप्त हुआ। हालांकि यह आदेश प्राप्त करने वाले जिले के अन्य डॉक्टर भी थे लेकिन उस समय कोरोना के डर के कारण उन्होंने विभिन्न कारणों से वहां जाने में असहमति जता दी। इस मुश्किल दौर में डॉ कांसल बिल्कुल भी नहीं घबराए। जबकि वह खुद शुगर, बीपी जैसी बीमारियों से पीडि़त हैं तथा उनका लगातार इलाज चल रहा है। जिस समय डॉ कांसल को इंदौर जाने का आदेश हुआ उससे ऐन पहले ही इंदौर में कई डॉक्टर्स की जान तक चली गई थी। इन खबरों से डॉक्टर का परिवार काफी डरा हुआ था। इसके बावजूद डॉ कांसल ने न सिर्फ खुद के हौसले को बढ़ाया बल्कि परिवारजनों को भी हिम्मत दी। इसके बाद डॉ कांसल ने इंदौर जाकर न सिर्फ न सिर्फ कोविड आईसीयू बल्कि फील्ड में जाकर भी कोरोना संक्रमित मरीज खोजे और उनका इलाज किया। वे बताते हैं कि शुरूआत में कोरोना को लेकर काफी दहशत का माहौल था। इसलिए 5 से 6 घंटे तक पीपीई किट पहनकर काम करते थे। यह बहुत मुश्किल भरा समय होता था। काम के बीच खाना खाना व परिवार वालों से बात करना भी मुश्किल भरा था।
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कोविड वार्ड में ज्वाइन करते ही संक्रमित हो गया
कोविड वार्ड की युवा टीम में शामिल डॉ सुदर्शन कुशवाह बताते हैं उनकी पहली ज्वाइनिंग सीधे कोविड वार्ड में हुई। क्योंकि उस समय कोरोना शुरू हो गया था। पहली बार तो काफी डर महसूस हुआ। लेकिन अन्य युवा स्टाफ के साथ काम करते हुए कुछ दिनों में यह डर चला गया। इसी बीच वह कोरोना संक्रमित हो गए। जिससे उनके परिवार में काफी डर बैठ गया। लेकिन कोविड वार्ड की युवा टीम को वहां काम करते देख हौसला कम नहीं हुआ और स्वस्थ होने के बाद फिर से कोविड वार्ड में सेवाएं शुरू कर दीं।