ग्वालियर के रहने वाले
ध्रुव बताते हैं, पापा खुद बॉक्सर थे, इसलिए बचपन से बॉक्सिंग की टेक्निक सीख गए थे। घर में पढ़ाई के साथ प्रैक्टिस करते थे और जल्द ही खेल में माहिर भी हो गए। वर्ष-2014 में पहली बार स्कूल नेशनल खेलने का मौका मिला, लेकिन पदक नहीं जीत सका। बस उसके बाद से जोश दोगुना हो गया। इसके बाद स्कूल नेशनल में पहली बार कांस्य पदक जीता। फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।
खेलो इंडिया में कांस्य पदक जीता और भारतीय कैंप के लिए चयन हो गया। दुर्भाग्य रहा कि कोविड आ गया और खेल नहीं सका। 2023 में खेलो इंडिया रजत पदक जीता। दिल्ली एमेच्योर बॉक्सिंग एसोसिएशन की ट्रायल में भाग लेने का मौका मिला। 14 खिलाड़ियों में एक मैं भी था। 11 सर्विसेस के खिलाड़ियों को हराकर भारतीय टीम में चयन हुआ।
ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतना सपना
ध्रुव कहते हैं कि पढ़ाई के साथ बॉक्सिंग की पूरी तैयारी जारी है। एलएनआइपीई का अंतिम वर्ष है, उसके बाद बॉक्सिंग की कोचिंग लेकर ओलंपिक में खेलने की तैयारी के लिए जुटना है। अभी शनिवार-रविवार संस्थान से बाहर जाकर तैयारी करता हूं। इसके अलावा संस्थान के कुछ बॉक्सरों के साथ भी प्रैक्टिस करता हूं। खुद पर भरोसा है कि एक न एक दिन भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतकर जरूर लाऊंगा।
न कोच न पार्टनर, बस पंचिंग बैग ही सहारा
ध्रुव बताते हैं कि वह पापा से कोचिंग लेते हैं। समय-समय पर रेलवे और अन्य कोच से ट्रेनिंग लेते हैं, लेकिन कोई परमानेंट कोच नहीं है। कजाकिस्तान जाने से पहले पार्टनर बॉक्सर के पैर में चोट लग गई थी, इसलिए प्रैक्टिस करने में काफी परेशानी हुई। पिता टिप्स देते थे और पचिंग बैग पर प्रैटिक्स करता था। ध्रुव कहते हैं कि यदि सालभर कोई कोच साथ होता तो शायद पहली बार में ही गोल्ड जीतकर आता।
पिता बॉक्सर थे, स्वर्ण पदक जीता
ध्रुव ने बताया, पिता धीरेन्द्र सिंह बॉक्सर थे। ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में स्वर्ण पदक जीता था, लेकिन उन्हें जिंदगीभर अफसोस रहा कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं खेल सके। उनका जुनून था मेरे बेटे देश के लिए खेलें। इसलिए बचपन से मुझे और मेरे बड़े भाई को बॉक्सिंग ग्लब्स पहना दिए थे।