
नए साल का जश्न मनाने को तैयार है प्रदेश का यह शहर, पूरी दुनिया में है प्रसिद्ध
ग्वालियर। नए साल 2020 का जश्न मनाने के लिए हर कोई तैयार है और अब इंतजार है तो बस इस बात का कि कब नया साल आए। आज हम आपको प्रदेश का ऐतिहासिक शहर ग्वालियर से जुड़ी वो तमाम बाते बताने जा रहे हैं। जहां हर साल हजारों की संख्या में युवा और सभी उम्र के लोग नए साल का जश्र मनाने आते हैं। हम बात कर रहे हैं आगरा से महज 110 किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक शहर ग्वालियर की। जहा ग्वालियर किला व जयविलास पैलेस देश-दुनिया में ख्यात है।
किले पर जहां भारतीय स्थापत्य की दृष्टि से भव्य महल है। वही हिन्दू व जैन मंदिर एवं शैलोत्कीर्ण गुफाएं भी हैं, जिनमें कई राज आज भी दफन हैं। तोमर वंशी राजाओं के शासन काल में हुए कला व सांस्कृतिक विस्तार ने ग्वालियर किले को एक नई पहचान दी। ऐतिहासिक शहर ग्वालियर को ऋषि गालव की नगरी भी कहा जाता है। इन दोनों ही ऐतिहासिक स्थलों को देखने के लिए प्रतिदिन बड़ी संख्या में और नए साल पर हजारों की संख्या में लोग व विदेशी पर्यटक यहां आते है।
सुनने को मिलती है महानायक की आवाज
मध्यप्रदेश के ग्वालियर का उल्लेख पौराणिक गाथाओं में भी मिलता है। ग्वालियर किला गोपाचल पर्वत पर स्थिति है। विभिन्न अभिलेखों में गोपाचल पर्वत के अन्य नामों का भी उल्लेख मिलता है, जैसे गोपगिरि,गोप पर्वत,गोपाद्रि व गोपचन्द्र गिरीन्द्र। वही जैन समुदाय के लिए गोपाचल पर्वत एक पवित्र धर्म स्थली है। यहां प्रतिवर्ष महावीर जयंती पर हजारों की संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। 8वीं से 10वीं शताब्दी में मध्ययुगीन प्रतिहारी कछवाहा (कच्छपघात) शासकों के शासन काल के दौरान वैष्णव, शैव व जैन धर्मों को फलने-फूलने का मौका मिला। खास बात यह है कि ग्वालियर किले पर साउंड सिस्टम में बालीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की आवाज सुनने को मिलती है।
विख्यात हैं सास-बहू का मंदिर
सास-बहू का मंदिर किले के दक्षिणी भाग में पास-पास बने दो सहस्त्रबाहु मंदिर हैं, जो आज सास-बहू का मंदिर नाम से विख्यात हैं। यहां लगे शिलालेख के अनुसार इन देवालयों का निर्माण सन् 1093 ई. में पालवंश के राजा महिपाल कछवाहा द्वारा करवाया गया था। जनश्रुति के अनुसार उन्होंने बड़ा विष्णु मंदिर अपनी माता और समीप बने छोटे मंदिर को अपनी शिवभक्त पत्नी को समर्पित किया था। संभवत इन्हीं कारणों से सहस्त्रबाहू मंदिर का नाम सास-बहू का मंदिर रखा गया था।
चतुर्भुज मंदिर में हंै आकर्षक आकृतियां
ग्वालियर किले पर चतुर्भुज मंदिर दौ सौ फीट ऊंचे पहाड़ी चट्टान पर बना है,जो एक पहाड़ी को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया है। मंदिर में लगे शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण 876-877 ई. में कन्नौज के शासक मिहिर भोज के शासन काल में नियुक्त कोटपाल अल्ल के निर्देशन में बनवाया गया। मंदिर के गर्भगृह में चतुर्भुजी विष्णु भगवान की स्थानक (खड़ी) मूर्ति है। गर्भगृह के सामने स्तंभों पर टिके मुख्य मंडप की छत के नीचे श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई हैं। स्तम्भों पर कलश,कबूतर,घंटियां,देवी-देवताओं व पशुओं की आकर्षक आकृतियां उत्कीर्ण हैं।
पैलेस में हैं 400 कमरे
12,40,771 वर्ग फीट में फैले सिंधिया घराने का महल जय विलास पैलेस अपनी भव्यता व नक्काशियों के लिए देश-विदेश में जाना जाता है। जय विलास पैलेस का निर्माण महाराजा जयाजी राव सिंधिया ने आजादी से पहले सन 1874 में कराया था। उस समय इस महल की कीमत करीब 1 करोड़ (200 मिलियन डॉलर) रुपए आंकी गई थी। महल यूरोपीय आर्किटेक्ट और डिजाइन का बेहतरीन नमूना है। इसका निर्माण नाइटहुड की उपाधि से सम्मानित सर माइकल फिलोसे ने किया था। महल में बना दरबार हॉल लोगों में काफी ख्यात है। महल में कुल 400 कमरे है, जिसमें 40 कमरे म्यूजियम के तौर पर रखे गए हैं, जिसमें महल के अंदर की गैलरी, उस समय प्रचलित अस्त्र-शस्त्र, उस समय प्रयुक्त होने वाली डोली एवं बग्घी और कांच के पायों पर टिकी सीढिय़ों की रेलिंग म्यूजियम के रूप में दिखाई गई हैं। महल की ट्रस्टी ज्योतिरादित्य की पत्नी प्रियदर्शनी राजे सिंधिया हैं।
प्राचीन तेली का मंदिर
समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर बने तेली के मंदिर के रूप में देखने को मिलता है। लगभग सौ फुट की ऊंचाई के लिए किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है लेकिन अधिकांश विद्वानों का मत है कि इसका निर्माण कन्नौज के राजा यशोवर्मन ने सन् 750 ई. में करवाया था। इस मंदिर को देखने के लिए विदेश भी लोग आते हैं।
गोपाचल पर्वत पर आते हैं हजारों लोग
गोपाचल पर्वत के पूर्वी भाग में एक पत्थर की बावड़ी समूह में 26 चैत्य गुफाएं हैं, जिनमें तीर्थंकरों की स्थानक व आसनानस्थ मूर्तियां हैं। ये सभी चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। प्रतिमाओं के पाद पाठ पर शिलालेख भी खुदे हुए हैं। सबसे बाईं तरफ एक पत्थर की बावड़ी है। गुफानुमा प्रवेशद्वार वाली इस बावड़ी की छत को पत्थर के स्तम्भों से टिकाया गया है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनाई गई है।
गुफा समूह की दाईं तरफ 26वीं गुफा में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की 57 फीट ऊंची प्रतिमा है जो,धेरी गुफा में एक ही चट्टान काटकर अन्दर-अन्दर बनाई गई है। जिसे देखकर शिल्पियों के धैर्य एवं लगन का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इस गुफा समूह का निर्माण काल 15वीं शताब्दी का है। इस गुफा समूह तक पहुंचने के लिए पहाड़ी को काटकर 50 सीढिय़ां बनाई है। यहां नए साल का जश्र मनाने के लिए हजारों की संख्या में लोग हर साल आते हैं।
Updated on:
13 Dec 2019 03:39 pm
Published on:
13 Dec 2019 03:35 pm

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