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भले ही भगवान को साक्षी मानकर पति-पत्नी मान लिया है, सप्तपदी संस्कार का पालन नहीं हुआ

वन स्टॉप सेंटर से युवती को रिहा करने की अपील को खारिज किया

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भले ही भगवान को साक्षी मानकर पति-पत्नी मान लिया है, सप्तपदी संस्कार का पालन नहीं हुआ

भले ही भगवान को साक्षी मानकर पति-पत्नी मान लिया है, सप्तपदी संस्कार का पालन नहीं हुआ


ग्वालियर। अपर सत्र न्यायालय ने उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें वन स्टॉप सेंटर जेएएच में रह रही एक युवती को मुक्त करने के लिए दायर की थी। कोर्ट ने कहा कि भले ही दोनों भगवान को साक्षी मानकर एक दूसरे को पति-पत्नी मान लिया है और लिव इन में रह रहे थे। दोनों के बीच सप्तपदी संस्कार का पालन नहीं हुआ है। 18 से ऊपर की युवती कहीं भी रहने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन युवती की ओर से कहीं भी ऐसा सामने नहीं आया है कि उसे वन स्टॉप सेंटर में बंधक बनाया गया है। इसलिए अपील सारहीन व सुनवाई योग्य नहीं है।


मोहन सिंह कुशवाह ने अपर सत्र न्यायालय में एक अपील दायर की। उसकी ओर से तर्क दिया कि मैं व बैंजती बालिग होकर एक दूसरे को पति-पत्नी स्वीकार कर चुके हैं। अपनी पत्नी खुद पनिहार थाना लेकर पहुंचा था, लेकिन थाना प्रभारी ने दोनों के बयान दर्ज किए। बैजंती ने अपने माता-पिता के साथ जाने से इनकार कर दिया था। इस कारण उसे वन स्टॉप सेंटर भेज दिया। इसको लेकर न्यायिक मजस्ट्रिेट के यहां आवेदन दायर किया, जिसे खारिज कर दिया। न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ अपील दायर की है। कोर्ट ने उसकी अपील भी खारिज कर दी।

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