
देश ही नहीं विदेशों में भी है प्रदेश की इस गजक की पहचान, पानी की है तासीर
ग्वालियर। देश और विदेश में प्रदेश के चंबल का हमेशा से ही दबदबा रहा है। चाहे वह डकैतों के लिए प्रसिद्ध हो या फिर गजक के लिए। चंबल के पानी की मिठास ही ऐसी है कि यदि एक बार आपने इसका स्वाद चख लिया तो आप इसे दोबरा खाए बिना रह नहीं पाओगे। जी हैं हम बात कर रहे है मुरैना के गजक की। तो चलिए जानते है क्या खासियत है इस गजक की।
गजक के दीवाने हंै लोग
मध्यप्रदेश के चंबल जिले के मुरैना की गजक का स्वाद सौ साल पुराना है। सालभर और सबसे अधिक सर्दियों के मौसम में सर्वाधिक पसंद किए जाने वाली गजक देश में ही नहीं विदेशों तक खास डिमांड रहती है। आगरा, मुंबई, दिल्ली, जयपुर, हैदराबाद, कलकत्ता, भोपाल, इंदौर के अलावा अमेरिका, सिंगापुर, दुबई, श्रीलंका आदि देशों तक लोग इसके स्वाद के दीवाने हैं।
सरकार कर रही है ब्रांडिंग
गजक को लेकर गजक व्यवसायी इसकी गुणवत्ता और किस्मों को लेकर नित-नए प्रयोग करते रहे हैं। शुरूआत में सिर्फ तिल और गुड़ के मिश्रण से पट्टियों के रूप में बनाई जाने वाली गजक की अब लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक वैरायटी बाजार में आ चुकी हैं। गजक कोराबारी कहते है, सरकार ने जब से गजक की ब्रांडिंग करने का निर्णय लिया है तब से इस कारोबार को और अधिक लाभ मिला है।साथ ही रोजगार के अवसर भी बढ़े हैं और गजक का स्वाद देश-विदेश के कोने-कोने तक पहुंच सकेगा। यदि बात वर्तमान की जाए तो मुरैना जिले में गजक का व्यवसाय लगभग 20 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है। इतना ही नहीं अब तो मुरैना की गजक की ब्रांडिंग भी कमलनाथ सरकार कर रही है।
विदेशों तक जाती है चंबल की गजक
मकर संक्रांति और सर्दियों के मौसम में सर्वाधिक पसंद किए जाने वाली गजक देश के विभिन्न हिस्सों सहित विदेशों तक का सफर तय करती है। अमेरिका, सिंगापुर, दुबई, श्रीलंका सहित कई देशों व देश के आगरा, मुंबई, दिल्ली, जयपुर, हैदराबाद, कलकत्ता, भोपाल, इंदौर के अलावा तक नाते-रिश्तेदार लेकर जाते हैं। देश के कई बड़े शहरों में विक्रय के लिए मुरैना से प्रतिदिन सैकड़ों किलोग्राम गजक सप्लाई की जाती है। वहीं यहां के लोग विदेशों में रहने वाले अपने नाते-रिश्तेदारों अथवा मित्रों को भी इसे तोहफे के तौर पर भेजते हैं। विदेशी भी मुरैना की गजक को बड़े स्वाद से खाते हैं।
पानी की तासीर का है नतीजा
गजक के बड़े बड़े दुकानदार बताते है कि मुरैना में निर्मित गजक का बेजोड़ स्वाद यहां के पानी की खास तासीर का ही नतीजा है। तभी तो देश के कई हिस्सों में मुरैना के कारीगर गजक बनाने जाते हैं, लेकिन यहां तैयार होने वाली गजक के जैसा स्वाद नहीं आता। इसलिए अब गजक तैयार करने के लिए मुरैना का पानी भी देश के विभिन्न हिस्सों में मंगाया जाने लगा है। साथ ही ज्यादातर लोग मुरैना की गजक को खाना ही पंसद करते हैं।
दो कारीगर घंटों कूटते हैं गजक
मुरैना की गजक स्वाद के मामले में जितनी बेजोड़ होती है, उतनी ही मेहनत इसे बनाने में लगती है। इसकी बड़ी विशेषता इसका खस्ता (कुरकुरा) होना है। बड़े से कड़ाह में गुड़ की चासनी बनाई जाती है। इसे फेंटकर आधा इंच की परत में बदला जाता है। इसके ऊपर कूटा हुआ तिल बिछाया जाता है। दो कारीगर लकड़ी के हथौड़े से घंटों इसे कूटते हैं। गुड़ और तिल की तब तक कूटाई की जाती है जब दोनों आपस में पूरी तरह मिल न जाएं। फिर इसे ट्रे में रखकर काटा जाता है। अब इसमें सूखे मेवे का भी उपयोग होने लगा है।
गजक कि आ चुकी हैं कई वैरायटी
आपको बता दें कि मुरैना में गजक का सफर अब लगभग 100 साल का हो चुका है। इस व्यवसाय से जुड़े लोग अपने स्तर पर ही इसकी गुणवत्ता और किस्मों को लेकर नित-नए प्रयोग करते रहे हैं। शुरूआत में सिर्फ तिल और गुड़ के मिश्रण से पट्टियों के रूप में बनाई जाने वाली गजक की अब लगभग डेढ़ दर्जन वैरायटी बाजार में आ चुकी हैं। इनमें तिल फैनी, तिल समोसे, तिल बर्फी, तिल लड्डू, तिल बालूशाही, फ्लेवर्ड गजक रोल सहित ड्रायफ्रूट्स से बनने वाली गजक भी शामिल है। कुछ व्यवसायी तो अब सुगर फ्री गजक भी बनाने लगे हैं। पिछले वर्ष तिल और गुड़ के मिश्रण से तैयार की गई गजक की मूर्तियां भी यहां खासी चर्चाओं में रह चुकी हैं।
Published on:
13 Jan 2020 03:00 pm

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