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बांसुरी से मैं हर भाव, त्योहार व लोकरंगों की अभिव्यक्ति करता हूं: संतोष संत

आइटीएम संगीत सम्मेलन ‘रंग-प्रसंग’ में सुरमयी प्रस्तुतियां

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बांसुरी से मैं हर भाव, त्योहार व लोकरंगों की अभिव्यक्ति करता हूं: संतोष संत

बांसुरी से मैं हर भाव, त्योहार व लोकरंगों की अभिव्यक्ति करता हूं: संतोष संत

ग्वालियर

ग्वालियर मेरे लिए तीर्थ स्थान जैसा है क्योंकि यहीं मेरा जन्म हुआ और बचपन बीता, यहीं मैंने सबसे पहले संगीत सीखा। मेरे गुरू श्रीराम उमड़ेकर जी ने ही मुझे आदेश दिया कि अब तुम्हारा समय पंडित हरिप्रसाद चौरसिया जी से संगीत की शिक्षा लेने का है और मैं वहां चला गया। बांसुरी से ही मैं हर भाव, त्योहार व लोकरंगों की अभिव्यक्ति करता हूं। कुछ ऐसे ही भावों के साथ नाद एम्फीथिएटर में शुरूआत हुई आइटीएम के 14वें संगीत सम्मेलन ‘रंग प्रसंग’ की, जहां मुम्बई से बांसुरी वादक संतोष संत की प्रस्तुति व मथुरा की आस्था गोस्वामी का गायन हुआ।

राग वाचस्पति से बांसुरी वादन का शुभारंभ
सबसे पहले संतोष संत की प्रस्तुति हुई, उन्होंने राग वाचस्पति से बांसुरी वादन शुरू किया। इसमें सबसे पहले आलाप, जोड़, झाला प्रस्तुत किया। इसके बाद रूपक ताल व द्रुत तीन ताल में निबद्ध रचनाएं प्रस्तुत की। आखिर में उन्होंने खास प्रस्तुति दी जिसमें होली के विभिन्न राग, ठुमरी-दादरा काफी और लोक रचनाओं की कम्पोजीशन प्रस्तुत की। इसमें लग्गियां भी थी और सवाल भी। जिसका संगीत रसीकों ने भरपूर आनंद लिया। उनके साथ तबले पर पं अनुतोष देघारिया, बांसुरी पर शिष्य विशाल पाठक और गिटार पर अमित रॉय ने साथ दिया।


मोपे डालो न रंग गिरधारी
दूसरी सभा आस्था गोस्वामी की थी। उन्होंने गायन की शुरुआत सरस्वती वंदना से की। इसके बाद राग मारू विहाग से गाना शुरू किया। उन्होंने दो बंदिशे गाईं। पहली बंदिश एक ताल में विलंवित थी जिसके बोल रसिया हो न जा। दूसरी बंदिश तीन ताल में थी जो द्रुत बंदिश थी। बोल थे वेग तुम आओ सुंदरवा। इसके बाद एक होली गाई जिसके बोल थे मोपे डालो न रंग गिरधारी, जो दादरा ताल में निबद्ध थी। इइसके बाद उन्होंने चैती गाई जिसके बोल थे चैत मास बोले रे कोयलिया हो रामा थे।

रिम्पा शिवा और मंजुषा पाटिल कुलकर्णी का गायन आज
रविवार को रिम्पा शिवा का तबला वादन और मंजुषा पाटिल कुलकर्णी का गायन शाम 7 बजे सिथौली परिसर में होगा।

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