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देश के भविष्य को काबिल बनाने किए नवाचार, कई अवार्ड पाकर शहर को दिलाई पहचान

स्किल बेस्ड लर्निंग पर रखा फोकस

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देश के भविष्य को काबिल बनाने किए नवाचार, कई अवार्ड पाकर शहर को दिलाई पहचान

देश के भविष्य को काबिल बनाने किए नवाचार, कई अवार्ड पाकर शहर को दिलाई पहचान

महेश गुप्ता

ग्वालियर.

बच्चों की नींव स्कूल से तैयार होती है। भविष्य के सपने वो यहीं से संजोते हैं। एबीसीडी सीखने से लेकर डॉक्टर, इंजीनियर, साइंटिस्ट बनने तक के सपनों का ताना-बाना यहीं से बुना जाता है। ऐसे में बहुत फर्क पड़ता है कि बच्चे को स्कूल में क्या नयापन मिल रहा है। वह पढ़ाई के साथ-साथ स्किल बेस्ड लर्निंग में वह क्या कर रहा है। यह सब डिपेंड करता है स्कूल के प्रिंसिपल की लीडरशिप पर। आज स्कूल प्रिंसिपल दिवस के अवसर पर हम आपको कुछ ऐसे ही प्रिंसिपल से परिचित करा रहे हैं, जिन्होंने बच्चों को पढ़ाई के लिए अच्छा माहौल दिया। इसके लिए उन्हें कई जगहों से सम्मानित भी किया गया।

छात्रों की आउटसाइड स्टडी के लिए बनवाए लर्निंग पार्क
मैं केन्द्रीय विद्यालय क्रमांक-2 से 2018 में रिटायर हुई। कुल 15 साल मैं प्रिंसिपल रही। मैं जहां भी रही हमेशा आउटसाइड लर्निंग पर फोकस रखा। मेरा मानना था कि बच्चे जो किताबों में तस्वीर देखकर पढ़ते हैं, वो आउटसाइड जाकर खुद देखें। इसके लिए मैंने स्कूल में ही छह लर्निंग पार्क बनवाए। इनमें मैथमैटिकल, स्काउट एंड गाइड, इको पार्क, जॉग्रफिकल पार्क शामिल थे। मोबाइल इंग्लिश लैंग्वेज पार्क बनवाने से पहले ही मैं रिटायर हो गई। उस समय केवीएस के कमिश्नर ने मेरी सोच को सरहा और कई केन्द्रीय विद्यालय में पार्क बनवाए। मुझे मुझे सन् 2000 में संगठन की ओर से नेशनल अवार्ड, 2015 में प्रेसीडेंट अवार्ड मिल चुका है, जिसने मेरा हौसला बढ़ाया।
रेखा सक्सेना, पूर्व प्रिंसिपल

स्कूल में लगाई नैपकीन यूनिट, प्रिंसिपल आते हैं ट्रेनिंग लेने
मैं 23 साल से प्रिंसिपल के पद पर हूं। 13 साल मुझे ग्वालियर में हो गए। उस समय मेरा स्कूल देशभर में 22वें नंबर पर था, जिसे मैं अपने टीचर्स और मैनेजमेंट के सपोर्ट से नंबर वन पर लेकर आई। हमने कई ऐसे काम किए, जो सिर्फ सोचा ही करते थे। सन् 2012 में हमने सेनेटरी नैपकीन यूनिट स्कूल में लगाई। साथ ही दो गांवों की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने काम दिया। आज इस यूनिट से प्रशिक्षण लेेने कई स्कूल के प्रिंसिपल आ चुके हैं और वो अपने यहां भी यूनिट लगवा रहे हैं। हमने धरोहर फेस्टिवल की शुरुआत की, जिसके कारण देशभर से आने वाले छात्र संस्कृति से परिचित हो सके। वर्तमान में हम ऑर्गेनिक फॉर्मिंग पर काम कर रहे हैं। बच्चों ने रोबोट बनाया है, जिसका नाम सासा रखा है। मुझे सीबीएसई की ओर से नेशनल अवॉर्ड, सुशमा स्वराज स्त्री शक्ति अवार्ड, वुमन एंड चाइडल इनोवेटिव प्रिंसिपल के अवार्ड से नवाजा जा चुका है।
निशि मिश्रा, प्रिंसिपल

पठन सामग्री को सरल बनाने तैयार किया दिमागी मानचित्र और परिवर्णी शब्द
मैं पिछले 20 साल से एक ही संस्थान में बच्चों के बीच हूं। इसके पहले बैंगलुरू में वाइस प्रिंसिपल रही। टीचिंग में मेरा आना सन् 1989 में हुआ। तब से आज तक बच्चों को कुछ नया सिखाना ही मोटिव रहा। कुछ समय पहले मैंने टीम के सपोर्ट से माइंड मैप तैयार किया, जिसकी मदद से छात्र कक्षा में पढ़ाए गए पाठ को एक नजर में याद कर सकते हैं। यह सभी कक्षाओं में लागू किया गया। छात्रों को अब एक आरेखीय चार्ट से पूरा पाठ याद रखना बहुत आसान हो गया है। दूसरा परिवर्णी शब्द तैयार किया। यह सीनियर छात्रों के लिए है। इसकी मदद से छात्र बड़े पाठों को सरल तरीके से याद रख सकते हैं, जहां छात्र बिंदु में सबसे महत्वपूर्ण शब्द के अक्षर का चयन करते हैं। मुझे सीसबीएसई ने सन् 2013 में नेशनल अवार्ड फॉर टीचर दिया। पांच साल से लगातार जोनल प्रिंसिपल अवार्ड मिल रहा है।
राजेश्वरी सावंत, प्रिंसिपल

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