
डकैती का दाग मिटा पर कोर्ट में मौजूद नहीं थे सिंधिया, पढ़ें पूरी खबर
ग्वालियर। शहर के सबसे चर्चित हाइप्रोफाइल हिरन वन कोठी डकैती कांड में सभी आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया है। विशेष न्यायाधीश रविन्दर सिंह ने आरोपियों को दोषमुक्त करते हुए कहा कि इस मामले में किसी आरोपी के खिलाफ कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है इसलिए सभी को दोषमुक्त किया जाता है। शुक्रवार को विशेष न्यायाधीश रविन्दर सिंह ने जब फैसला सुनाया तब अदालत में आरोपी कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक शर्मा, अरुण सिंह तोमर, रविन्द्र सिंह भदौरिया, उदयवीर सिंह, ए एम भोंसले, बाल खांडे व रमेश शर्मा थे।
अन्य आरोपी विलास लाड, राम उर्फ मुन्ना भार्गव, विधायक केपी सिंह उपस्थित नहीं थे। ३५ साल बाद जब अदालत ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त किया तो सभी आरोपियों के चेहरे खिल गए। सभी का कहना था उन्हें उम्मीद थी कि उनके साथ न्याय होगा।
सरदार आंग्रे को रहने के लिए दी थी हिरनवन कोठी
स्व राजमाता विजयराजे सिंधिया ने अपने निज सचिव सरदार संभाजीराव आंग्रे को सन् १९७३ में जय विलास परिसर स्थित हिरनवन कोठी रहने के लिए दी थी। इसका उपयोग इस मामले में परिवादिनी चित्रलेखा राजे अपने पिता संभाजीराव आंग्रे के साथ करती थी। उन्हें यह कब्जा मौखिक रुप से दिया गया था। १९७९ में चित्रलेखा के नाम से किरायानामा लिखा गया।
चित्रलेखा द्वारा न्यायालय में प्रस्तुत परिवाद में कहा गया कि १३ अगस्त १९८३ को शाम ५ से ६ बजे के बीच स्व माधव राव सिंधिया को छोड सभी १५ आरोपियों ने अन्य आरोपियों के साथ कोठी पर तैनात कर्मचारी व चौकीदारों को बंदूक की नोक पर खदेडते हुए बाहर निकाल दिया। इस कोठी में उनके पांच पालतू कुत्ते थे,जिनमें से उन्हें केवल दो कुत्ते मिले थे। जबकि दो कुत्तों का खून वहां मिला था। परिवाद में कहा गया कि आरोपी उनका घरु सामान लूटकर ले गए थे।
परिवाद में कहा गया कि यह वारदात सिंधिया को हिरनवन कोठी शांति निकेतन संग्रहालय व ट्रस्ट ऑफिस पर जबरन कब्जा प्राप्त करने के लिए की गई। परिवाद में कहा गया कि इस संग्रहालय की बहुमूल्य वस्तुओं को सिंधिया अपने कब्जे में लेना चाहते थे। इसलिए उन्होंने चोरी का मामला दर्ज कराया था। जिससे कि वे उनके पिता को यहां से निकाल सकें। जब उनके सारे प्रयास विफल हुए तब उन्होंने यह डकैती का षड्यंत्र रचा था। ११ अगस्त ८३ को राजमाता एवं १२ अगस्त ८३ को सरदार आंग्रे इंग्लेड जा रहे थे तब परिवादी और उनका परिवार उन्हें छोडने दिल्ली गये थे।
कोठी में केवल नौकर थे। उसी दौरान १३ अगस्त को कोठी पर कब्जा कर लिया गया तथा सामान लूट लिया गया। घटना की रिपोर्ट सुषमा देवी प्रबंधक सिंधिया संग्रहालय ने झांसी रोड में की थी। सांसद नारायण कृष्ण शेजवलकर ने प्रशासन को भी कार्रवाई के लिए कहा था। प्रार्थिनी ने कहा कि उन्हें जब इस घटना की जानकारी मिली तो वे हवाई जहाज से ग्वालियर के लिए रवाना हुई किंतु दुभाग्य से वह यान ग्वालियर न रुक कर नागपुर जाकर रुका।
इसके बाद वे १५ अगस्त को ग्वालियर आई और पुलिस को शिकायत करने पहुंची लेकिन पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। उनका आरोप था कि कांग्रेस सरकार के कारण इस मामले में कार्रवाई नहीं की गई थी। इसलिए उन्होंने अभियोग प्रस्तुत किया। जिस पर सभी आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ था। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा था। इस मामले में आरोपीगण की ओर से अधिवक्तागण मुकेश गुप्ता, संजय शर्मा, प्रेम सिंह भदौरिया,अभिषेक शर्मा, देवेन्द्र कुशवाह, चेन सिंह राजपूत, देशराज भार्गव ने पैरवी की।
इनका हो गया निधन
इस मामले में मुख्य आरोपी पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व माधव राव सिंधिया, चन्द्रकांत मांढरे,महेन्द्र प्रताप सिंह,तत्कालीन पार्षद नरेन्द्र सिंह तथा शरद शुक्ला का निधन हो चुका है। वहीं प्रमुख गवाह भाजपा की संस्थापक राजमाता विजयाराजे सिंधिया,पूर्व महापौर माधव शंकर इंदापुरकर, तत्कालीन सांसद एनके शेजवलकर, पूर्व मंत्री शीतला सहाय, गंगाराम बांदिल, सरदार संभाजीराव आंगे्र का निधन हो चुका है।
ग्वालियर से बाहर जाने पर लगी थी रोक
इस मामले में सुनवाई के दौरान कोर्ट ने आरोपियों के ग्वालियर से बाहर जाने पर रोक लगा दी थी। बाद में उन्हें न्यायालय की अनुमति से बाहर जाने की अनुमति मिली थी। आरोपी उदयवीर सिंह का शस्त्र लायसेंस तो अभी तक निलंबित है। उनके पास पोर्ट भी जब्त हो गए थे।
११६ बार इंदौर से ग्वालियर आए अमर सिंह भोंसले
इस मामले की सुनवाई के लिए आरोपी अमर सिंह भोंसले ११६ बार इंदौर से ग्वालियर आए।
इन धाराओं में दर्ज था अपराध
आरोपियों पर भादसं की धारा ३९५, ३९७, ४२९, ४५२, १४७, १४८ १४९, २०१,१२० बी तथा डकैती अधिनियम के अपराध में प्रकरण दर्ज किया गया था।
दादा ने जनता को न्याय के जिस भवन को बनवाया उसी भवन में पौत्र के खिलाफ मुकदमा
इंदरगंज स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय के जिस भवन में यह मुकदमा चला उस भवन का निर्माण प्रथम माधव राव सिंधिया ने इंटर कॉलेज के लिए कराया था। बाद में उनके पुत्र जीवाजी राव सिंधिया ने यहां उच्च न्यायालय का शुभारंभ राज्य की जनता को न्याय दिलाने के लिए किया था। बाद में यहां से उच्च न्यायालय नये भवन में चला गया और यहां जिला न्यायालय रह गया। जिसमें ३५ साल तक मुकदमा चला।
पहला मामला है जो इतना लंबा चला
इस मामले में आरोपी केपी सिंह के अधिवक्ता मुकेश गुप्ता का कहना था कि उनके जीवन का डकैती का यह पहला एेसा हाईप्रोफाइल मामला है जो ३५ साल तक चला।
एेसी है हिरनवन कोठी
जयविलास परिसर में बनी हिरनवन कोठी एक शताब्दी से अधिक पुराना है।
-नक्काशीदार कोठी वैभवशाली सुविधाओं से युक्त थी। इस कोठी में दुर्लभ वस्तुओं का संग्रह था।
-कोठी के आस पास वन में हिरण विचरण करते थे इसलिए इसे हिरनवन कोठी नाम दिया गया।
-वर्तमान में इस शानदार कोठी को लोगों ने नष्ट कर दिया है। इसके बाद से इसकी सुरक्षा के लिए चाहरदीवारी बनाई गई है और उच्च न्यायालय ने यहां रिसीवर की नियुक्ति की है।
चित्रलेखा के खिलाफ करेंगे मुकदमा
इस मामले में दोषमुक्त हुए बाल खांडे ने कहा कि चित्रलेखा द्वारा की गई एक झूठी शिकायत के कारण उन्होंने तथा उनके साथियों ने ३५ साल तक डकैती के आरोपों के साथ समाज में जीवन जिया है। इस मुकदमें ने उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को धूमिल किया है। इसे वे भूल नहीं सकेंगे। इसलिए वे इस मामले में परिवादी चित्रलेखा के खिलाफ मानहानि का मुकदमा लगायेंगे।
सत्य की विजय
पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक शर्मा ने कहा कि उन्हें भरोसा था कि हम सभी को न्याय मिलेगा। देर भले ही लगी लेकिन हमारे साथ न्याय हुआ है। यह सत्य की विजय है।
Published on:
19 May 2018 07:03 pm

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