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लोगों की पीड़ा देख बन गई डॉक्टर, अब समाजसेवा ही लक्ष्य

डॉ. वारुणी का बचपन से रहा सेवा का जज्बा

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लोगों की पीड़ा देख बन गई डॉक्टर, अब समाजसेवा ही लक्ष्य

लोगों की पीड़ा देख बन गई डॉक्टर, अब समाजसेवा ही लक्ष्य

ग्वालियर.

मुझमें बचपन से सेवा का भाव रहा। मैं जब भी किसी बीमार या जरूरतमंद को देखती थी तो बहुत पीड़ा होती, सोचती कि काश मैं इनके लिए कुछ कर पाऊं। इस पीड़ा ने मुझे डॉक्टर बना दिया। हालांकि पापा पॉलीटिक्स में रहे। उनका सपना था कि मैं आइएएस, आइपीएस बनू, लेकिन मुझे डॉक्टर ही बनना था। यह दृढ़ निश्चय मेरा तब और बढ़ गया, जब एमबीबीएस की पढ़ाई के दौरान मैंने अपने भाई वैभव को खोया। इसके बाद मैंने दूसरों का जीवन बचाने की ठानी और गाइनिकोलॉजिस्ट बनी। अब जब मेरे प्रयास से नन्हीं आंखें दुनिया देखती हैं तो दिल को शुकून मिलता है। यह कहानी है ग्वालियर की बेटी डॉ. वारुणी शुक्ला की, जो हर समय मरीजों की सेवा के लिए तत्पर रहती हैं।

मेरी चैलेंजिंग फील्ड, हर समय इमरजेंसी के लिए रहती हूं तैयार
डॉ. वारुणी ने बताया कि गाइनिक बहुत ही चैलेंजिंग फील्ड है। हमें हर समय इमरजेंसी के लिए तैयार रहना पड़ता है। मेरे दो बच्चे अन्वी और अयन हैं, जो अभी छोटे हैं। कई बार ऐसी सिचुएशन बनती है कि बच्चे साथ रहने की जिद करते हैं और मुझे मरीज को ऑपरेट करने निकलना होता है। ऐसे में मैं उन्हें समझाती हूं और फिर निकलती हूं। क्योंकि मरीज को समय पर इलाज देना मेरी प्राथमिकता है। मुझे यह जिम्मेदारी निभाने में पति नवीन शुक्ला और मां भी सपोर्ट करती हैं।

भाई के नाम पर बनवाया हॉस्पिटल
मेरा सन् 2005 में एमबीबीएस कम्प्लीट हुआ। इसके बाद 2008 एमएस हुआ। इसके बाद प्रैक्टिस की। दिल्ली में सेवा देने के बाद देहरादून मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर और फिर मौलाना मेडिकल कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर रही। कुछ साल पहले ही पापा ने भाई के नाम पर हॉस्पिटल बनवाया, जिसे संभालने ग्वालियर आ गई।

मैं कई बार टूटी और उठ खड़ी हुई
मेरे जीवन में रिश्ते बहुत अहम हैं। मैं अपने भाई और पापा से बहुत क्लोज थी। जब हम उम्र भाई दुनिया छोडकऱ गया तो ऐसा लगा कि मानो सब छिन गया हो। फिर कोविड में पापा नहीं रहे। उनका सपना था कि मैं उन लोगों के काम आऊं, जिनके पास कोई नहीं है। उसी राह पर मैं अपने पति के साथ चल रही हूं। मैंने कोविड काल में भी अपनी जान की परवाह किए बिना सेवाएं दीं।

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